बच्चों की दुनियाँ को तहस नहस करता मोबाइल
- आसिम अनमोल
बच्चों की दुनिया कितनी मासूम हुआ करती थी। बच्चों को खुद नहीं पता होता था कि वो कब सोएंगे कब जागेंगे। क्या खाएंगे क्या पिएंगे। कितना चुप रहेंगे और कितना बोलेंगे। अपनी रूचि के अनुसार कहाँ घूमने जाएँगे और कहाँ नहीं। यह सब देवता समान माता पिता ही तय करते थे। माता पिता की हर एक आज्ञा का पालन बच्चों के द्वारा पूरी सहजता पूरे सम्मान से ख़ुशी ख़ुशी किया जाता था। आज के मशीनी युग में बच्चों की दुनियाँ को लेकर बच्चों की प्रायं घट रही हर गतिविधियों का हर दृश्य उल्टा पुल्टा ही देखने को मिल रहा है। इसके पीछे अपने भविष्य को दांव पर लगाते बच्चों का मोबाइल की दुनियाँ में निरंतर चिपके रहना अपने आपमें बहुत ही दुःखद है। बच्चें जिनका कोमल मन यह समझने में सक्षम ही नहीं है कि जिस डिजिटल दुनियाँ में वो खोए हुए हैं ,वो सारी वर्चुअल व्यवस्था ही बच्चों की सोचने समझने की सलाहियत और मानसिकता को पूरी तरह तहस नहस कर रही है।
बच्चों की नाज़ुक मानसिकता पर जब इस बित्ते भर के मोबाइल का सुनोयोजित तरीके से गलत प्रभाव पड़ता है ,तो बच्चें यह सोचने में पूरी तरह नाकाम हो जाते हैं कि उनके भविष्य के साथ ऐसा खिलवाड़ हो सकता है जिसकी भरपाई बरसों बरस तक नहीं की जा सकती। बच्चोँ के जीवन को पूरी तरह हाइजेक कर रहा मोबाइल अब अपनी मर्ज़ी से बच्चों को बिगाड़ने पर आमादा है। इसी कारण बच्चें भी पढ़ाई लिखाई में मन नहीं लगा पा रहे हैं ,और बच्चों की शिक्षा बुरी तरह बाधित हो रही है। सर्वे बताते हैं कि आधुनिकता में खोए हुए आज के आधुनिक बच्चे घरेलू खेलों से दूर होते जा रहे हैं। जो बच्चे पहले प्ले ग्राउंड में खेलने जाते थे। लूडो ,कैरम , आइस पास , इंडोर गेम में दिलचस्पी लेते थे। आज वो स्मार्ट फ़ोन से चिपके रहते हैं। माता पिता की ज़रूरी आवाज़े भी उनके कानों को बुरी लगती हैं। मोबाइल के अंधे प्रेम के आगे बच्चे अपने माता पिता का खुलेआम अनादर कर रहे हैं। बच्चों को अपने आसपास हो रही क्रिया कलाप से भी कोई मतलब नहीं रहता। आजकल के बच्चे स्क्रीन स्क्रॉल के एडिक्ट होते जा रहे हैं। स्मार्ट गैजेट्स यानी छोटे छोटे तकनीकी उपकरण ने हर उम्र के लोंगो की ज़िन्दगी तबाह कर दी है। इसी लिए बच्चों के अंदर तनाव , चिंता ,चिड़चिड़ापन और अवसाद बच्चों के विहेवियर में साफ़ दिख रहा है। आज के बच्चें इतने स्क्रीन डोमिनेटेड लाइफ स्टाइल के ग़ुलाम होते जा रहे हैं कि वे अलग तरीक़े से कुछ कम्युनिकेट करना चाहते हैं। आख़िर ऐसी कौन सी बातचीत है जो बच्चे आज के समय में जीवन को खतरे में डालकर करना चाह रहे हैं।
वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर बिखरी हल्की सामग्री बच्चों के दिलों दिमाग़ पर बहुत ग़लत प्रभाव डाल रही है। यही मुख्य कारण है कि बच्चें अपने ही माता पिता से नज़दीकी का एक अच्छा रिश्ता नहीं बना पा रहे हैं। बच्चों का बाल मन जो अपने अभिभावक के द्वारा दी गई अच्छी परवरिश की तरफ़ आकर्षित होना चाहिए वो नाज़ुक बाल मन मोबाइल चलाने की प्रतिस्पर्धा में ख़र्च हो रहा है। सोचनीय प्रश्न है ऐसी स्थिति में जो बच्चें मानसिक रूप से पूरी तरह हार रहे हैं। उनके क़ीमती जीवन स्तर को विजय के शिकर तक पहुँचाने की बहुत बड़ी एक पारिवारिक और सामाजिक चुनौती सामने आ गई है। बच्चों की दुनियाँ जो मोबाइल तक सिमट रही है उसके पीछे बच्चों का ज़्यादा देर तक रात को जागना भी ज़िम्मेदार है। बच्चों के अंदर स्मार्टफ़ोन का बढ़ता उपयोग एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। हाल ही में शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन में साफ़ आया है कि छात्र - छात्राएँ स्कूलों के दौरान भी मोबाइल का उपयोग करने से नहीं हिचक रहे हैं ।
बच्चों द्वारा पाठ्यक्रम कम पढ़ा जा रहा है। मोबाइल के अंदर आभासी दुनियाँ की हिंसक सामग्री की स्टडी बड़ी ज़िम्मेदारी से की जा रही है। शिक्षण संस्थानों तक में बच्चों की नज़रे मोबाइल पर प्रति दिन लगभग सत्तर - पचहत्तर बार जाती हैं जो बच्चों के हित में नहीं कही जा सकतीं। इन सब चीज़ों से बच्चों का अध्ययन , प्रदर्शन ,ध्यान , और आत्म विश्वास बुरी तरह कमज़ोर होता है। इससे बच्चों की पढ़ाई करने के फोकस पर भी पूरी तरह से ध्यान हट जाता है। कुल मिलाकर बच्चों के संस्कारिक जीवन को बचाना है तो आधुनिक और आभासी दुनियाँ के बारे में बच्चों को जागरूक करना नितांत आवश्यक है। बच्चों के अंदर मोबाइल देखने की ललक को आप त्वरित ठीक नहीं कर सकते। इसके लिए बच्चो के अंदर संतुलित और डिजिटल अनुशासन के बारे में जागरूक करना बहुत ज़रूरी है।



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