मेरठ से उठी एक छोटी पहल, अब गंगा की रखवाली कर रहे हजारों कछुए

118 कछुओं से शुरू हुआ अभियान सात जिलों तक पहुंचा, किसान बने 'गंगा मित्र'

मेरठ। कभी हस्तिनापुर के मखदूमपुर गंगा घाट पर महज 118 कछुओं के संरक्षण से शुरू हुई एक छोटी-सी पहल आज गंगा संरक्षण का बड़ा जनआंदोलन बन चुकी है। मेरठ से शुरू हुआ यह अभियान अब सात जिलों में गंगा के 225 किलोमीटर लंबे क्षेत्र तक फैल चुका है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इस अभियान के असली नायक सरकारी अधिकारी नहीं, बल्कि गंगा किनारे रहने वाले किसान हैं, जिन्होंने अपनी खेती से पहले प्रकृति को महत्व दिया।

प्रदेश सरकार, वन विभाग, जिला गंगा समिति और डब्ल्यूडब्ल्यूएफ-इंडिया के संयुक्त प्रयासों से शुरू हुई इस परियोजना में अब करीब पांच हजार कछुओं का संरक्षण किया जा रहा है। यह केवल वन्यजीव संरक्षण की कहानी नहीं, बल्कि इंसान और प्रकृति के बीच बढ़ते भरोसे की मिसाल भी है।

जब किसानों ने छोड़ दी खेती, बच गए हजारों कछुए

कछुए हर वर्ष गंगा किनारे रेत में 50 से 100 मीटर की दूरी पर अंडे देते हैं। पहले खेती और मानवीय गतिविधियों के कारण बड़ी संख्या में अंडे नष्ट हो जाते थे। जागरूकता अभियान के बाद स्थानीय किसानों ने करीब 90 हेक्टेयर भूमि पर स्वेच्छा से खेती न करने का निर्णय लिया। यही निर्णय हजारों नवजात कछुओं के लिए जीवनदान साबित हुआ।

इन्हीं किसानों को प्रशिक्षण देकर 'गंगा मित्र' बनाया गया, जो अब अंडों की सुरक्षा से लेकर कछुओं के संरक्षण तक हर स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

दोगुनी हुई सफलता

जिला गंगा समिति के जिला परियोजना अधिकारी तुषार गुप्ता के अनुसार, वैज्ञानिक संरक्षण और स्थानीय सहयोग के कारण कछुओं का सर्वाइवल रेट 40 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गया है। मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर में स्थापित हैचरियों ने इस सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

क्यों जरूरी हैं कछुए?

जिला वन अधिकारी वंदना फौगाट बताती हैं कि कछुए गंगा के प्राकृतिक सफाईकर्मी हैं। वे नदी में मौजूद सड़े-गले जैविक अवशेषों और अन्य कार्बनिक पदार्थों को खाकर जल को स्वच्छ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि कछुओं की बढ़ती संख्या गंगा के बेहतर स्वास्थ्य का भी संकेत मानी जाती है।

मेरठ बना संरक्षण का मॉडल

जो अभियान कभी केवल मेरठ जिले के 45 किलोमीटर क्षेत्र तक सीमित था, वह आज मेरठ, बिजनौर, मुजफ्फरनगर, हापुड़, संभल, अमरोहा और बुलंदशहर सहित सात जिलों में फैल चुका है। पर्यावरण विशेषज्ञ इसे उत्तर प्रदेश में सामुदायिक सहभागिता से संचालित सबसे सफल संरक्षण अभियानों में से एक मान रहे हैं।

गंगा की स्वच्छता की यह कहानी बताती है कि जब सरकार, प्रशासन और समाज एक साथ कदम बढ़ाते हैं तो छोटी-सी शुरुआत भी बड़े बदलाव का आधार बन सकती है।

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