रिश्तों में खोता भावनात्मक जुड़ाव
- संध्या अग्रवाल
किसी भी सभ्य समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक प्रगति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि वह अपने रिश्तों को कितनी संवेदनशीलता, विश्वास और आत्मीयता से जीता है। विडंबना यह है कि आज संचार के साधन जितने विकसित हुए हैं, मनुष्य के बीच भावनात्मक जुड़ाव उतना ही कम होता जा रहा है। शब्द बढ़े हैं, लेकिन अपनापन घटा है। यही दूरी कई बार रिश्तों में अविश्वास, मानसिक तनाव और अंततः सामाजिक त्रासदियों की पृष्ठभूमि तैयार करती है।
हाल के वर्षों में रिश्तों से जुड़े अनेक दर्दनाक अपराधों ने समाज को झकझोर दिया है। इन घटनाओं को केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न मान लेना पर्याप्त नहीं होगा। इनके पीछे बदलते सामाजिक मूल्य, भावनात्मक अपरिपक्वता और रिश्तों के प्रति बदलता दृष्टिकोण भी जिम्मेदार है। जिन संबंधों की नींव विश्वास और सम्मान पर रखी जाती है, वे हिंसा और प्रतिशोध तक क्यों पहुँच रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।
आज बच्चों और युवाओं को सफलता प्राप्त करना तो सिखाया जाता है, लेकिन असफलता को स्वीकार करना नहीं। उन्हें अपने अधिकारों का बोध कराया जाता है, पर दूसरे व्यक्ति के निर्णय और स्वतंत्रता का सम्मान करना कम सिखाया जाता है। परिणामस्वरूप, जब कोई रिश्ता अपेक्षा के अनुरूप नहीं चलता या समाप्त हो जाता है, तो कुछ लोग उसे जीवन की सामान्य घटना मानने के बजाय अपने अहं पर चोट समझ बैठते हैं।
प्रेम कभी अधिकार या स्वामित्व नहीं होता। वह विश्वास, सम्मान और स्वतंत्रता का नाम है। जब प्रेम पर अधिकारबोध हावी होने लगता है, तब संवेदनाएँ पीछे छूट जाती हैं। रिश्तों में अपनापन कम होने लगता है और अहंकार निर्णय लेने लगता है। यहीं से अविश्वास, कटुता और कई बार हिंसक प्रवृत्तियाँ जन्म लेती हैं।
परिवारों की बदलती संरचना ने भी इस समस्या को गहरा किया है। संयुक्त परिवारों के विघटन के साथ अनुभव साझा करने के अवसर कम हुए हैं। माता-पिता अपनी व्यस्तताओं में उलझे हैं और बच्चे डिजिटल दुनिया में। एक ही घर में रहते हुए भी भावनात्मक दूरी बढ़ती जा रही है। अनेक युवा अपनी उलझनों को किसी विश्वसनीय व्यक्ति से साझा नहीं कर पाते। भीतर जमा तनाव कभी अवसाद का रूप लेता है तो कभी आक्रोश का।
सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ा अवश्य है, लेकिन कई रिश्तों को सतही भी बना दिया है। त्वरित आकर्षण, दिखावे की संस्कृति और आभासी स्वीकृति की चाह ने धैर्य, त्याग और आत्मसंयम जैसे गुणों को कमजोर किया है। अब कई बार रिश्तों को भी सुविधा के आधार पर परखा जाने लगा है। जहाँ स्वार्थ समाप्त हुआ, वहाँ संबंध भी कमजोर पड़ने लगे। यह प्रवृत्ति समाज के भावनात्मक स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है।
समस्या का समाधान केवल कठोर कानूनों में नहीं है। कानून अपराध होने के बाद सक्रिय होता है, जबकि समाज की भूमिका उससे पहले शुरू होती है। परिवारों में ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ बच्चे बिना भय के अपनी भावनाएँ व्यक्त कर सकें। विद्यालयों में जीवन-कौशल और भावनात्मक शिक्षा को महत्व देना होगा। युवाओं को यह समझाना होगा कि किसी संबंध का समाप्त होना जीवन का अंत नहीं होता और किसी भी परिस्थिति में हिंसा समाधान नहीं हो सकती।
मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। अपराध को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने के बजाय उसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। इससे समाज केवल भयभीत नहीं होगा, बल्कि आत्ममंथन भी करेगा।
आखिरकार, किसी भी रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत केवल प्रेम नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव है। जहाँ विश्वास, सम्मान और अपनापन जीवित रहते हैं, वहाँ मतभेद भी रिश्तों को नहीं तोड़ पाते। लेकिन जहाँ मन का जुड़ाव समाप्त हो जाता है, वहाँ रिश्ते केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं और वहीं से अनेक सामाजिक त्रासदियों की शुरुआत होती है। इसलिए आज सबसे अधिक आवश्यकता रिश्तों में संवेदना, विश्वास और भावनात्मक निकटता को पुनर्जीवित करने की है।
(स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार)






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