महिला सुरक्षा : सरकारी दावे और जमीनी हकीकत
- गंगा पाण्डेय
किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज की पहचान इस बात से होती है कि वहां महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों को कितना सुरक्षित वातावरण प्राप्त है। सरकारें समय-समय पर कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने, अपराधियों पर कठोर कार्रवाई करने और महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के दावे करती हैं। उत्तर प्रदेश सहित देश के कई राज्यों में यह दावा किया जाता है कि अपराध और अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया गया है तथा कानून का भय अपराधियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
महिला सुरक्षा के लिए हेल्पलाइन, विशेष पुलिस इकाइयों, महिला थानों, फास्ट ट्रैक अदालतों और विभिन्न जागरूकता अभियानों की शुरुआत भी की गई है। इन प्रयासों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है, किंतु समय-समय पर सामने आने वाली जघन्य घटनाएं इन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी लगाती हैं। गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन क्षेत्र में सात वर्षीय बच्ची का संदिग्ध परिस्थितियों में शव मिलना, जिसके साथ दुष्कर्म और हत्या की आशंका व्यक्त की गई, केवल एक घटना नहीं बल्कि समाज और प्रशासन दोनों के सामने खड़ी गंभीर चुनौती का प्रतीक है।
ऐसी घटनाएं यह सोचने पर विवश करती हैं कि यदि कानून का भय वास्तव में अपराधियों में है, तो फिर इस प्रकार के अपराध लगातार क्यों हो रहे हैं। महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध होने वाले अपराध केवल व्यक्तिगत विकृति का परिणाम नहीं होते, बल्कि इनके पीछे सामाजिक, मानसिक, आर्थिक और प्रशासनिक अनेक कारण भी जुड़े होते हैं। अपराधी तब तक अपराध करने का साहस नहीं कर सकते जब तक उन्हें कहीं न कहीं व्यवस्था की कमजोरी, कानून के धीमे क्रियान्वयन या पकड़े जाने की कम संभावना का विश्वास न हो। इसलिए केवल कठोर कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी और निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।
सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। महिला हेल्पलाइन 1090 और 112, मिशन शक्ति अभियान, एंटी रोमियो स्क्वॉड, सीसीटीवी निगरानी, महिला पुलिसकर्मियों की संख्या में वृद्धि तथा डिजिटल शिकायत प्रणाली जैसे कदम निश्चित रूप से सकारात्मक हैं। इनसे कई मामलों में महिलाओं को तत्काल सहायता भी मिली है और अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई भी हुई है। पुलिस की त्वरित प्रतिक्रिया और तकनीकी संसाधनों के उपयोग से अपराधों के खुलासे की गति बढ़ी है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि इन व्यवस्थाओं का लाभ तभी मिलेगा जब प्रत्येक नागरिक इनके प्रति जागरूक होगा और प्रत्येक क्षेत्र में इनका समान रूप से प्रभावी संचालन होगा।
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक मानसिकता भी है। आज भी समाज के अनेक हिस्सों में महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। पितृसत्तात्मक सोच, लैंगिक भेदभाव, अशिक्षा, नशाखोरी, अश्लीलता का दुरुपयोग तथा नैतिक मूल्यों का ह्रास कई बार अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। जब तक परिवार और समाज में बचपन से ही लड़कों को महिलाओं के प्रति सम्मान, संवेदनशीलता और समानता का संस्कार नहीं दिया जाएगा, तब तक केवल कानूनी उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएंगे। शिक्षा संस्थानों, परिवारों और सामाजिक संगठनों को मिलकर ऐसी मानसिकता विकसित करनी होगी जिसमें महिला को सम्मान और सुरक्षा देना प्रत्येक व्यक्ति का नैतिक दायित्व माना जाए।
महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में न्याय प्रक्रिया की गति भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कई मामलों में जांच और न्यायिक प्रक्रिया लंबी होने से पीड़ित परिवारों का विश्वास कमजोर पड़ता है। कई बार गवाहों पर दबाव, सामाजिक बदनामी का भय तथा कानूनी जटिलताएं भी न्याय मिलने में बाधा बनती हैं। ऐसे मामलों में समयबद्ध जांच, वैज्ञानिक साक्ष्य संग्रह, फास्ट ट्रैक अदालतों की प्रभावी कार्यप्रणाली तथा दोषियों को शीघ्र और उचित दंड मिलना आवश्यक है। जब अपराधियों को यह विश्वास होगा कि वे किसी भी स्थिति में कानून से बच नहीं सकते, तभी अपराधों पर वास्तविक नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अपराधों के वास्तविक आंकड़े और दर्ज मामलों में अंतर पाया जाता है। अनेक महिलाएं सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा, पुलिस के प्रति अविश्वास या प्रताड़ना के डर से शिकायत दर्ज ही नहीं करातीं। ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में यह समस्या और अधिक गंभीर है। इसलिए केवल दर्ज मामलों के आधार पर सुरक्षा की स्थिति का मूल्यांकन पर्याप्त नहीं माना जा सकता। प्रशासन को ऐसा वातावरण तैयार करना होगा जिसमें प्रत्येक पीड़ित बिना किसी भय के अपनी शिकायत दर्ज करा सके और उसे सम्मानजनक व्यवहार तथा त्वरित न्याय का भरोसा मिले।
महिलाओं की सुरक्षा केवल सरकार या पुलिस की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नागरिकों को भी संदिग्ध गतिविधियों की सूचना तुरंत पुलिस को देनी चाहिए, सार्वजनिक स्थानों पर संवेदनशील व्यवहार अपनाना चाहिए तथा किसी भी प्रकार की हिंसा या उत्पीड़न को सामान्य घटना मानकर अनदेखा नहीं करना चाहिए। स्थानीय समुदाय, विद्यालय, महाविद्यालय, स्वयंसेवी संस्थाएं और मीडिया भी जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। तकनीक का उपयोग करते हुए सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, बेहतर स्ट्रीट लाइट, सीसीटीवी नेटवर्क तथा आपातकालीन सहायता प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए।
महिलाओं की सुरक्षा के संबंध में किए जा रहे सरकारी प्रयासों का महत्व अपनी जगह है, किंतु उनकी सफलता का वास्तविक मूल्यांकन जमीनी स्तर पर अपराधों में कमी और महिलाओं के भीतर सुरक्षा की भावना से ही होगा। गाजियाबाद जैसी दर्दनाक घटनाएं यह संकेत देती हैं कि अभी भी व्यवस्था में कई स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है। कानून का कठोर और निष्पक्ष पालन, त्वरित न्याय, संवेदनशील पुलिस व्यवस्था, सामाजिक जागरूकता, नैतिक शिक्षा तथा नागरिक सहभागिता, इन सभी के संयुक्त प्रयास से ही महिलाओं के लिए वास्तव में सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है। किसी भी राज्य की वास्तविक प्रगति केवल विकास परियोजनाओं से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वहां की प्रत्येक महिला और बच्ची बिना भय के सम्मानपूर्वक जीवन जी सके। यही सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण और लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी।
(लेखिका बाढ़, पटना से हैं)



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