सिने अभिनेता मनीष वाधवा पहुंचे मेरठ
बोले—पेस्टिसाइड्स के बढ़ते इस्तेमाल से कोई घर पूरी तरह सुरक्षित नहीं
‘द इंडिया स्टोरी’ की विशेष स्क्रीनिंग में हरित क्रांति के बाद बदली कृषि व्यवस्था और रासायनिक खेती के दुष्परिणामों पर हुई चर्चा
मेरठ। शास्त्रीनगर स्थित पीवीएस मॉल में प्रदर्शित फिल्म ‘द इंडिया स्टोरी’ की विशेष स्क्रीनिंग में शामिल होने के लिए सिने अभिनेता मनीष वाधवा मुंबई से मेरठ पहुंचे। अरिहंत ज्वैलर्स मेरठ की ओर से आयोजित विशेष प्रदर्शन के लिए थियेटर बुक किया गया था। कार्यक्रम में लोकप्रिय कवयित्री एवं स्टार पोएट डॉ. अनामिका जैन अंबर और क्रांति कवि सौरभ जैन सुमन भी मौजूद रहे।
फिल्म के विषय पर अभिनेता मनीष वाधवा ने कहा कि ‘द इंडिया स्टोरी’ हरित क्रांति के बाद पैदा हुई परिस्थितियों और उनके गंभीर परिणामों पर नई सोच प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि पेस्टिसाइड्स के बढ़ते इस्तेमाल के कारण आज कोई भी घर पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। दूध, फल और सब्जियों समेत रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में रसायनों के प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ रही है।
क्रांति कवि सौरभ जैन सुमन ने फिल्म को महज मनोरंजन का माध्यम न बताते हुए इसे अस्तित्व और न्याय के संघर्ष का आईना बताया। उन्होंने कहा कि फिल्म एक ऐसे बेबस और निर्धन पिता की कहानी के माध्यम से व्यवस्था पर सवाल उठाती है, जो अपनी बेटी की मौत के बाद न्याय के लिए सरकार और विभिन्न स्तरों पर संघर्ष करता है। उन्होंने कहा कि आम व्यक्ति के लिए आज भी व्यवस्था से न्याय हासिल करना आसान नहीं है।
कवयित्री डॉ. अनामिका जैन अंबर ने कहा कि जिस दौर में देश खाद्यान्न संकट और युद्ध जैसी परिस्थितियों से गुजर रहा था, उस समय खेती में हरित क्रांति की आवश्यकता थी। रासायनिक खेती से उत्पादन बढ़ा, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में जैविक खेती को बढ़ावा देने और कृषि में रसायनों के इस्तेमाल को नियंत्रित करने की दिशा में प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।
अरिहंत ज्वैलर्स के स्वामी रितेश जैन ने थियेटर बुक कर फिल्म की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की और अभिनेता मनीष वाधवा का सम्मान किया। इस दौरान मनीष वाधवा ने अरिहंत ज्वैलर्स परिवार के साथ इंटरवल में केक काटकर फिल्म के गंभीर और सारगर्भित विषय का उत्सव मनाया।
रितेश जैन ने कहा कि मनोरंजन आधारित फिल्मों को देखने के लिए दर्शक बड़ी संख्या में थियेटर पहुंचते हैं, लेकिन जब कोई फिल्म स्वास्थ्य, जीवन और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों को सामने रखती है तो दर्शकों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो जाती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे ऐसी फिल्मों को थियेटर में जाकर देखें और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर बनने वाले सार्थक सिनेमा को प्रोत्साहित करें।


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