लखनऊ अग्निकांड से उठते कई सवाल

- डॉ.ओपी चौधरी
लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में विगत दिनों एक कोचिंग-सह-गेमिंग संस्थान में भीषण आग लग गई। आग लगने के बाद कई छात्र जान बचाने के लिए ऊपरी मंजिलों से कूदते दिखाई दिए। मौके पर दमकल की कई गाड़ियाँ, पुलिस और राहत दल पहुँचे तथा बचाव अभियान चलाया गया। शुरुआती खबरों में कई लोगों के घायल होने और कम-से-कम चार लोगों के मृत होने की आशंका जताई गई थी,लेकिन अब मृतकों की संख्या 19 बताई जा रही है।दर्जनों घायलों का इलाज जारी है।
 लखनऊ के अलीगंज में लगी आग ने केवल एक कोचिंग संस्थान को ही नहीं जलाया, बल्कि उस पूरे कोचिंग तंत्र की परतें उतार दी हैं, जो अब एक शहर या एक घटना तक सीमित नहीं, बल्कि कोटा, दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी, कानपुर, पटना और देश के हर “रैंक फैक्ट्री” तक फैला हुआ एक समानांतर शिक्षा साम्राज्य बन चुका है। जिन इमारतों पर “भविष्य निर्माण”, रैंक गारंटी और आईआईटी/नीट की सीढ़ी जैसे चमकदार होर्डिंग टंगे हैं, उन्हीं की खिड़कियों से आज छात्र केवल सफलता नहीं, बल्कि कई बार अपना जीवन बचाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। कोटा तो आत्महत्या का केंद्र होता जा रहा है।
यह दृश्य किसी एक शहर की दुर्घटना नहीं, बल्कि पूरे कोचिंग उद्योग की सामूहिक आत्मा का आईना है, जहाँ कोटा की गलियों में सपने पैक होकर आते हैं और दिल्ली के विज्ञापन बोर्डों पर “सेलेक्शन रिकॉर्ड” बेच दिए जाते हैं।यहाँ शिक्षा नहीं दी जाती,यहाँ भविष्य का उत्पादन-लाइन मॉडल चलता है जहाँ आ कर बच्चा स्टूडेंट नहीं, इन्वेस्टमेंट बन जाता है।

यह घटना केवल अग्निकांड नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर प्रश्नचिह्न है जिसमें सुरक्षा मानक अक्सर नोटिस बोर्ड पर होते हैं, लेकिन वास्तविकता में सिर्फ फायर एग्जिट का एक पेंट किया हुआ तीर होता है, कुछ सिलिंडर होते हैं, वह भी पुराने, जो प्रायः काम नहीं करते हैं। यदि भवन में निकासी मार्ग संकरे हैं, ऑक्सीजन कम है और कक्षाएँ क्षमता से दोगुनी भरी हैं, तो यह दुर्घटना नहीं, बल्कि नियोजित उदासीनता का परिणाम है। आग शॉर्ट-सर्किट से लगी हो सकती है, लेकिन व्यवस्था में लगा करंट वर्षों से बह रहा था।

कोटा में कोचिंग उद्योग ने  सपनों की अर्थव्यवस्था खड़ी की है जहाँ हर साल हजारों छात्र आते हैं,और कुछ सफलताओं के पोस्टर में बदल जाते हैं, बाकी आंकड़ों और फाइलों में दब जाते हैं। दिल्ली में यही "मॉडल ब्रांडिंग"और मार्केटिंग के साथ प्रीमियम एजुकेशन का रूप ले लेता है।और देश के छोटे शहरों में इसका नकल-उद्योग चलता है, जहाँ कोचिंग सेंटर शिक्षा कम और आश्वासन अधिक बेचते हैं।

भारतीय शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि यहाँ प्रतियोगी परीक्षाएँ अब प्रतिभा की नहीं, बल्कि आर्थिक क्षमता, मानसिक दबाव और सहनशीलता की परीक्षा बन चुकी हैं। सफलता का टिकट अब ज्ञान नहीं, बल्कि कोचिंग की फीस, टेस्ट सीरीज़ का पैकेज और डाउट क्लास का सब्सक्रिप्शन है। संविधान समान अवसर का वादा करता है,लेकिन कोचिंग बाजार अवसर को बैच, फीस स्लैब और रैंक पैकेज में बदल चुका है।

सबसे असहज प्रश्न यह है कि क्या हमारे विद्यालय और विश्वविद्यालय केवल औपचारिकता भर रह गए हैं? यदि सरकारी शिक्षक, प्रोफेसर और संस्थान छात्रों को उस प्रतियोगिता के लिए तैयार नहीं कर पा रहे, जिसके लिए कोचिंग अनिवार्य हो चुकी है,तो समस्या छात्र की नहीं, पूरी शिक्षा संरचना की है, व्यवस्था की है और इस संरचना में सबसे सुरक्षित स्थिति कोचिंग उद्योग की है जो असफलता को भी मॉक टेस्ट की तरह बेच देता है।
इस पूरे तंत्र का सबसे दुखद पहलू है कि जब वह सफल होता है, तो इसे हमारी कोचिंग की उपलब्धि कहा जाता है, लेकिन जब बच्चा अवसादग्रस्त हो या आत्महत्या कर ले तो यह उसकी व्यक्तिगत असफलता मान लिया जाता है, कोचिंग संस्थान पल्ला झाड़ लेता है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद वही पुरानी पटकथा चलती है कि जाँच समिति, रिपोर्ट, बयान, मुआवज़ा और कुछ दिनों की संवेदना फिर सब कुछ वैसे ही चलता रहता है जैसे पहले चलता था, क्योंकि सिस्टम बदलने के लिए नहीं, केवल प्रतिक्रिया देने के लिए प्रशिक्षित है।
लखनऊ की यह आग केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे कोचिंग साम्राज्य की नैतिक परीक्षा है। यदि शिक्षा सच में व्यापार बन चुकी है, तो यह आग केवल इमारत में नहीं लगी यह उस विचार में लगी है, जिसमें भविष्य को पैकेज में बेचा जा रहा है और यदि यही प्रवृत्ति जारी रही, तो आने वाले समय में केवल संस्थान नहीं जलेंगे, बल्कि वह भरोसा भी राख हो जाएगा जिस पर पूरा शिक्षा तंत्र खड़ा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 जिसे नई दुल्हन की तरह बड़े सजा-संवार कर यह सरकार लायी है, भारतीय ज्ञान परंपरा का खूब ढिंढोरा पीट रही है, वह बेमानी साबित होगी। अपने प्रदेश में बुलडोजर न्याय का प्रतीक है। यदि ऐसा है तो प्रश्न यह है कि बुलडोजर केवल सड़क के अपराधियों के लिए ही क्यों आरक्षित है? क्या शिक्षा के नाम पर सुरक्षा नियमों की अवहेलना करने वाले, छात्रों को भेंड़ की भीड़ की तरह भरने वाले और छात्रों के सपनों को मुनाफे की वस्तु में बदल देने वाले श्वेतपोश लोग किसी अलग श्रेणी के नागरिक हैं? बाबा का बुलडोजर अपराधियों पर चले ये ना चले इन श्वेतपोश अपराधियों पर तत्काल चलना चाहिए और प्रदेश से समानांतर शिक्षा व्यवस्था को बुलडोजरों से रौंद दिया जाना चाइए। क्या बाबा बुलडोजर ऐसा कर पाएंगे यह एक यक्ष प्रश्न है।
(सेवानिवृत्त शिक्षक काशी)

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