दवा और स्वास्थ्य
इलमा अज़ीम
स्वास्थ्य किसी भी लोकतांत्रिक राज्य में केवल सेवा का विषय नहीं बल्कि नागरिक के जीवन और गरिमा से जुड़ा मूल अधिकार है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में राज्य को जनस्वास्थ्य सुधारने का दायित्व सौंपा गया है। इसी दृष्टि से प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना की शुरुआत हुई थी। इसका उद्देश्य अत्यंत स्पष्ट और जनपक्षधर था देश के गरीब, निम्न मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले नागरिकों को कम कीमत पर उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराना ताकि इलाज आर्थिक बोझ न बन जाए।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा जेनेरिक दवा उत्पादक देशों में से एक है, लेकिन विडंबना यह रही कि लंबे समय तक भारतीय मरीजों को ब्रांडेड दवाओं के लिए अत्यधिक कीमत चुकानी पड़ती रही। ऐसे परिदृश्य में जन औषधि योजना सामाजिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरी। योजना के तहत दावा किया गया कि ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90 प्रतिशत तक कम कीमत पर गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। महिलाओं के लिए मात्र एक रुपये में ‘जन औषधि सुविधा’ सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना भी इस योजना की उल्लेखनीय उपलब्धि मानी गई।
सरकार ने देशभर में हजारों जन औषधि केंद्र स्थापित किए और लगातार लोगों से अपील की कि वे महंगी ब्रांडेड दवाओं के बजाय जेनेरिक दवाओं पर भरोसा करें। लेकिन किसी भी जनकल्याणकारी योजना की सफलता उसके उद्घाटनों, विज्ञापनों या आंकड़ों से नहीं बल्कि उस अंतिम व्यक्ति के अनुभव से तय होती है जो सेवा लेने केंद्र तक पहुंचता है। यदि वह मरीज दवा लेने के लिए जन औषधि केंद्र जाता है और उसे बार-बार यह उत्तर मिलता है कि “स्टॉक नहीं है”, तो योजना का पूरा नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है।देश के अनेक जन औषधि केंद्रों पर लंबे समय से हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक स्वास्थ्य, महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चों से संबंधित आवश्यक दवाओं की अनुपलब्धता की शिकायतें सामने आ रही हैं। यह समस्या केवल किसी एक दवा की कमी नहीं है।
यह उस भरोसे के टूटने का संकेत है जिस पर पूरी योजना आधारित है। दवा ऐसी वस्तु नहीं जिसे महीनों बाद खरीदा जा सके। मधुमेह, हृदय रोग या रक्तचाप से पीड़ित मरीजों के लिए नियमित दवा जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यदि उन्हें जन औषधि केंद्र से दवा नहीं मिलती, तो वे विवश होकर निजी मेडिकल दुकानों से कई गुना अधिक कीमत पर वही दवा खरीदते हैं। सबसे अधिक नुकसान उसी गरीब नागरिक को होता है, जिसके लिए यह योजना बनाई गई थी। यहीं से प्रश्न उठता है कि क्या केवल कम कीमत घोषित कर देना पर्याप्त है, या सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि हर जन औषधि केंद्र पर आवश्यक दवाओं की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित की जाए? यही प्रश्न आज जन औषधि योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है।





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