समाज से उठती गंभीर चेतावनियां
ईलमा अज़ीम
केतन अग्रवाल हत्याकांड ने एक बार फिर भारतीय समाज की उन परतों को उधेड़ दिया है, जिन्हें देखते-समझते हुए भी अक्सर नजरें फेर ली जाती हैं, क्योंकि हमें आदर्शवादी समाज का दिखावा बनाए रखना है। पहले पहल इसे सामान्य दुर्घटना मानकर सिया के लिए ही सबकी सहानुभूति उमड़ी कि नवंबर में इनकी शादी होनी थी, जिसके लिए दोनों परिवार जमकर तैयारी कर रहे थे।
लोग और समाज जयपुर में शाही अंदाज में शादी करवाने के लिए 17 करोड़ रूपयों में एक महल भी बुक करवा लिया गया था, लेकिन उससे पहले इतना बुरा हादसा हो गया। लेकिन पुलिस ने जब सारे तथ्यों की गहराई से पड़ताल की तो यह समझने में वक्त नहीं लगा कि यह सामान्य हादसा नहीं बल्कि सोची-समझी साजिश के तहत की गई हत्या थी। अब सिया पुलिस की गिरफ्त में है, केतन के घरवाले स्वाभाविक तौर पर उसके लिए कड़ी से कड़ी सजा की मांग कर रहे हैं।
ठीक ऐसा ही सवाल पिछले साल मेघालय में क्रूरता से मारे गए राजा रघुवंशी के घर वाले भी पूछ रहे थे। जब राजा से शादी करने के चंद दिनों बाद सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर उनकी हत्या कर दी थी। इंदौर से लेकर पुणे तक अपने जीवनसाथी को मारने की घटनाएं समाज में बढ़ती आपराधिक प्रवृत्ति को तो दिखाती ही हैं, साथ ही यह संकेत भी देती हैं कि एक बनी-बनाई लीक पर समाज को चलाने की कोशिश कई बार कितने भयावह परिणाम लाती है।
न जाने क्यों भारतीय समाज में अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुनने या किसी से प्यार करने के बाद शादी करने को हिकारत से देखा जाता है। आज के दौर में भी बहुत से अभिभावक यह कहने से हिचकते हैं कि उनकी बेटी या बेटे ने अपनी मर्जी से जीवनसाथी चुना है। पितृसत्तात्मक समाज बेटे की पसंद को एक बार सहजता से स्वीकार कर भी ले, लेकिन अधिकतर घरों में बेटियां खुलकर जीवनसाथी के लिए अपनी मर्जी का इजहार कर ही नहीं पाती हैं। अगर करें तो उसे या तो पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव बताया जाता है, या फिर निर्लज्जता की श्रेणी में डाला जाता है। शायद इसी वजह से कई बार सही राह पर चलकर अपनी मर्जी बताने की जगह हत्या करने जैसा आपराधिक कदम उठाया जाता है, जिसकी कोई माफी नहीं दी जा सकती।
जो इंसान किसी दूसरे की जान लेने जैसा अतिरेक भरा कदम उठा सकता है, वो इतनी हिम्मत क्यों नहीं जुटा पाता कि शादी के लिए अपनी मर्जी बताए या मां-बाप के दबाव को मानने से इंकार करे। रोमांस सिया गोयल और सोनम रघुवंशी दोनों को अगर वाकई अपने पसंद के लड़कों से शादी करनी थी या मां-बाप की मर्जी से शादी नहीं करनी थी, तो वे पहले बता सकती थीं, इससे घर बर्बाद नहीं होते, न ही विवाह जैसी संस्था से भरोसा उठता। मगर इन्होंने गलत राह चुनी।
हालांकि इनके कारण केवल लड़कियों पर सवाल उठाने से इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं मिलेगा। अभी बीते दिनों नोएडा से लेकर भोपाल तक दहेज हत्याओं या ससुराल में मिली प्रताड़ना के कारण हुई मौतों के मामले सामने आए, जिनमें नवयुवतियों की जिंदगी बर्बाद हुई और उनके मां-बाप जिंदगी भर का दुख अब उठा रहे हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि बड़ों के सामने खुलकर अपनी राय रखने को आज भी बदतमीजी बताया जाता है। आदर्शवादी समाज होने का ढकोसला और ज्यादा खींचने की जगह अब बदलते माहौल की हकीकत को समझना और स्वीकार करना शुरु करना चाहिए।





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