क्रिप्टो का काला खेल

 रूस, ईरान और उत्तर कोरिया ने कैसे निकाला अमेरिकी पाबंदियों का तोड़?

नयी दिल्ली। अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों को अब क्रिप्टोकरेंसी बड़ी चुनौती दे रही है। 2025 में प्रतिबंधित देशों और ब्लैकलिस्टेड संस्थाओं ने करीब 100 अरब डॉलर के क्रिप्टो ट्रांजेक्शन किए। रूस, ईरान और उत्तर कोरिया इसका इस्तेमाल हथियारों की खरीद, तेल व्यापार, हैकिंग और सैन्य कार्यक्रमों की फंडिंग में कर रहे हैं।

अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देश दशकों से दुनिया भर में अपनी कूटनीतिक धाक बनाए रखने के लिए एक खास हथियार का इस्तेमाल करते आए हैं। ये हथियार है आर्थिक प्रतिबंध. जब भी कोई देश अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करता है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है या अवैध हथियार बनाता है, तो अमेरिका और पश्चिमी देश उसे ग्लोबल बैंकिंग सिस्टम से बाहर कर देते हैं। लेकिन, 2025 के आंकड़े बताते हैं कि अब इन बागी देशों ने इसकी एक अचूक काट ढूंढ ली है। यह काट है क्रिप्टोकरेंसी।

क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया अब केवल निवेशकों के मुनाफे का जरिया नहीं रह गई है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय पाबंदियों से बचने, आतंकवाद की फंडिंग करने और विनाशकारी हथियार खरीदने का बहुत बड़ा डार्क नेटवर्क बन चुकी है। आइए जानते हैं क्रिप्टो कैसे अमेरिका के प्रतिबंधों की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है, इसे किस तरह इस्तेमाल किया जा रहा हैं, स्टेबलकॉइन, क्रिप्टो मिक्सर और डिजिटल टोकन जैसे नए हथकंडे कैसे काम करते हैं। दुनिया की सबसे ताकतवर फाइनेंशियल एजेंसियां भी इस नेटवर्क पर लगाम क्यों नहीं लगा पा रही हैं।

100 अरब डॉलर का ब्लैक मार्केट

क्रिप्टो ट्रांजेक्शन और ब्लॉकचेन फ्लो को ट्रैक करने वाली प्रमुख एनालिटिक्स फर्मों और पश्चिमी देशों के अधिकारियों के मुताबिक, सिर्फ साल 2025 में ब्लैकलिस्टेड संस्थाओं ने लगभग 100 अरब डॉलर (लगभग 8.3 लाख करोड़ रुपये) की क्रिप्टोकरेंसी का लेन-देन किया है। यह कोई सामान्य व्यापार नहीं है। इस भारी-भरकम वर्चुअल करेंसी का इस्तेमाल टेरर फंडिंग, हथियारों की खरीद-फरोख्त और सैन्य उपकरणों को जुटाने के लिए किया जा रहा है। अमेरिका के दबाव और कड़े प्रतिबंधों को चकमा देने के लिए ईरान, रूस और उत्तर कोरिया जैसे देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए बड़े स्तर पर वर्चुअल करेंसी का इस्तेमाल कर रहे हैं।

ट्रे़डिशनल बैंकिंग सिस्टम को कैसे बायपास किया?

इस पूरे खेल को समझने के लिए जानना जरूरी है कि प्रतिबंध काम कैसे करते हैं. ग्लोबल ट्रेड मुख्य रूप से पारंपरिक बैंकों और स्विफ्ट'(SWIFT) जैसे अंतरराष्ट्रीय पेमेंट नेटवर्क के जरिए होता है. ये बैंक अमेरिका और पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को लागू करने में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं. अगर कोई ब्लैकलिस्टेड देश या संस्था डॉलर में लेन-देन करना चाहती है, तो ये बैंक उस ट्रांजेक्शन को तुरंत ब्लॉक कर देते हैं।

यहीं पर क्रिप्टोकरेंसी की एंट्री होती है. क्रिप्टो नेटवर्क डिसेंट्रलाइज्ड होते हैं। इसमें पैसा भेजने और पाने वाले के बीच कोई बैंक या सरकार नहीं होती। बागी देश इसी का फायदा उठा रहे हैं। वे पारंपरिक बैंकों को पूरी तरह से बायपास कर सीधे डिजिटल वॉलेट से वॉलेट में अरबों डॉलर का लेन-देन कर रहे हैं, जिसे रोक पाना पश्चिमी एजेंसियों के लिए मुश्किल है।

ड्रोन, हथियार और तेल की तस्करी का नया गठजोड़

पश्चिमी अधिकारियों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस और ईरान ने अमेरिकी पाबंदियों को धता बताने के लिए एक मजबूत डिजिटल नेटवर्क तैयार कर लिया है।

हथियारों की खरीद: रूस पर यूक्रेन युद्ध की वजह से प्रतिबंध लगे हैं और ईरान पर परमाणु कार्यक्रम की वजह से. लेकिन दोने देश वर्चुअल कैश का इस्तेमाल करके इंटरनेशनल ब्लैक मार्केट से घातक ड्रोन और हथियारों के पार्ट्स खरीद रहे हैं. इन पेमेंट्स का कोई बैंकिंग ट्रेल (सुराग) नहीं होता।

कच्चे तेल की तस्करी और नाविकों की सैलरी

 रूस पर अपने कच्चे तेल को बेचने पर भारी प्रतिबंध हैं. इससे बचने के लिए रूस डार्क फ्लीट का इस्तेमाल कर रहा है जो दुनिया भर में उसके प्रतिबंधित कच्चे तेल की तस्करी करते हैं. इस तेल की तस्करी करने वाले नाविकों की सैलरी भी अब क्रिप्टोकरेंसी में दी जा रही है।

हैकिंग से लेकर सैन्य उपकरणों की खरीद तक

उत्तर कोरिया दुनिया का सबसे अलग-थलग देश है, जिस पर सबसे कड़े प्रतिबंध लागू हैं। लेकिन जब बात क्रिप्टोकरेंसी की आती है, तो उत्तर कोरियाई हैकर्स ने इसमें महारत हासिल कर ली है।

क्रिप्टो की चोरी: उत्तर कोरिया सिर्फ क्रिप्टो का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, बल्कि वह इसे चुरा भी रहा है. स्टेट स्पॉन्सर्ड साइबर क्राइम और हैकिंग के जरिए उत्तर कोरियाई हैकर्स ग्लोबल क्रिप्टो एक्सचेंजों से हर साल अरबों डॉलर चुराते हैं।

फ्यूल और हथियारों की खरीद: चुराई गई इस वर्चुअल करेंसी का इस्तेमाल प्योंगयांग (उत्तर कोरिया की राजधानी) अपने देश के लिए फ्यूल और सेना के लिए आधुनिक सैन्य उपकरणों की खरीद में कर रहा है। इसी पैसे से उत्तर कोरिया अपने मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों को फंडिंग दे रहा है।

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