दुर्घटना प्रधान देश में गैर इरादतन हत्या

- ललिता जोशी
अपने देश में आए दिन दुर्घटनाएं होती ही रहती हैं। इसीलिए अपना कृषि प्रधान देश अब दुर्घटना प्रधान देश बन चुका है। अभी हाल ही में देश में कई जगहों पर आग लगने से बहुत से आम लोगों की मृत्यु हो गई । एक होटल में तो विदेशी नागरिकों की मौत हो गई। ये सभी पास के अस्पताल में इलाज करवाने आए थे । इतना ही नहीं एक ही परिवार के 6 सदस्यों की इस दुर्घटना में मृत्यु हो गई । ऐसे ही दिल्ली से लेकर यूपी और बिहार तथा दक्षिण के राज्यों में आग से कई लोगों की मौत हो गई । इससे पहले बहुत से पुल ध्वस्त हुए और इनसे आम लोगों की मौत हुई । जब ऐसे कांड होते हैं तो सारी सिविक एजेंसियां हरकत में आ जाती हैं । प्रशासन आनन -फानन में कुछ अधिकारियों को निलंबित कर देता  है और फिर शुरू हो जाता है आरोप -प्रत्यारोप का दौर । ऐसे लगता है कि  कुत्ते ने बिल्ली पर आरोप लगाया और बिल्ली ने बकरी पर ।

ये सब देखकर लगता है कि एक डार्क मगर कॉमेडी  सर्कस चल रही है । इस सब में एक हैरान -परेशान करने वाली खबर हमेशा मिलती है कि आरोपियों पर अन्य धाराओं के तहत केस दर्ज किए गए हैं। इसके साथ गैर इरादतन हत्या का केस भी दर्ज कर लिया गया । गैर इरादतन हत्या यानि लापरवाही के कारण किसी की मृत्यु के लिए अभियुक्त को उत्तरदायी ठहराना। आजकल तो हादसे आए दिन होते रहते हैं । अभी हाल ही में दिल्ली से बिहार और बिहार से हैदराबाद तक आग लगने और इमारतों के ढहने से कई लोगों की मृत्यु हो गई । घर उजड़ गए ।

मामला दर्ज होता है गैर इरादतन हत्या का । लोग मर गए होटल और अस्पताल के मालिकों  के लालच और अधिकारियों के भ्रष्टाचार और पुलिस, प्रशासन और आस -पास के निवासियों की काहिली के कारण । किसी ने रिश्वत खाई, किसी ने व्यापार में अनुचित तरीके से लाभ कमाया और किसी ने  इन कानून तोडकों को आश्रय दिया । कुछ लोग ने  इन कानून तोडकों की अनुचित गतिविधियों को मूक दर्शकों की तरह देखा । ये सब देखकर लगता है कि बिल्ली को देखकर कबूतर अपनी आँखें बंद कर लेता है और वो सोचता है की बिल्ली चली गई लेकिन बिल्ली उसे झपट कर मार डालती है और उसको खा जाती है ।

अपने देश के लोगों की सहनशक्ति इतनी है की वो सब चुपचाप सहते रहते हैं तब-तक जब -तक की कुछ बड़ा न हो जाए । अस्पतालों में जलते-भुनते बच्चे और मरीज, कोचिंग सेंटरों में करेंट से मरते होनहार बच्चे, कहीं बिल्डिंग के ढहने से कोचिंग सेंटर में मरते युवा बच्चे । सच में एक बात समझ में नहीं आती कि हम लोग हादसे होने का इंतज़ार क्यों करते रहते हैं ? फिर फायर ब्रिगेड और नेशनल डिसास्टर मैनेजमेंट पर भी समय रहते मदद न करने का आरोप लगता है । अरे तंग और संकरी गलियों में कैसे पहुंचेंगे दमकल वाले । पहले तो इन इमारतों के मालिक गलत -सलत तरीके से  अवैध इमारतें बनाते  हैं और मोटी कमाई करते हैं फिर कोई दुर्घटना हो जाए तो राहत पहुँचाने वाली एजेंसियों पर आरोप लगाओ । ये वही बात हुई कि चोर कोतवाल को डांटे ।

हादसों के बाद दौर शुरू होता है लीपापोती का, एक दूसरे पर आरोप लगाने का और मुख्य आरोपी को देश से भागने में पूरी मदद की जाती है । ऐसे वाकये हुए हैं ।  अगर दुर्घटना का ये हीरो यानि मुख्य आरोपी अगर देश छोड़ कर भागने में सफल न हो सके तो उसे उसके भ्रष्टाचार में संलिप्त अधिकारी ही बचाव के उपाय बताते हैं । इन्सानों की जान चली जाती इन लालचियों के कारण और मामला दर्ज होता है गैर इरादतन हत्या का ।

यहाँ एक प्रश्न पुलिस और प्रशासन से है कि जब आमदनी के लिए नियम - कानून को ताक पर रखकर निर्माण किया जाता है तो ये तो उसी वक़्त पता होता है कि अगर कुछ अप्रत्याशित हुआ तो कौन जिम्मेदार होगा ? क्या उस समय मालूम नहीं होता कि अपने लाभ के लिए हम दूसरों के लिए मौत का फंदा तैयार कर रहे हैं । मगर अपने देश में सब चलता है की प्रवृति  इतनी हावी हो गई है कि अगर कुछ हो भी गया तो ले देकर मामला निपटा लिया जाएगा ।

धन्य है हमारा प्रशासन और मशीनरी जिसने मालवीय नगर हादसे के मुख्य आरोपी को गिफ़्तार कर लिया जो कि एक कुक है। इतना ही नहीं इन दुर्घटनाओं की एक खलनायिका बिजली भी क्योंकि जब इसका शॉर्ट सर्किट होता है तो आग लग जाती है । शायद इस कुक ने  नियमानुसार 6 कमरों की जगह 21 कमरे बनाए थे बेचारा मालिक क्या ही करता। प्रशासन, नगर निगम और स्थानीय निवासी भी निरीह थे । इसीलिए इरादतन हत्याओं को गैर इरादतन हत्याओं में परिवर्तित कर दिया जाता है।

मेरा भारत महान है । गौतम बुद्ध ,महावीर और गांधी का देश है ये । अपने यहाँ तो चीटियों को भी नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है क्योंकि जीव हत्या का पाप जो लगता है धर्मानुसार और कुत्तों को बचाने के लिए हम कोर्ट तक पंहुंच जाते हैं लेकिन लालच के कारण इंसान वो भी विदेशी मरीज जिंदा जल जाते हैं। ऐसे समय जानवरों के कल्याण के काम में लगे एक्टिविस्ट किधर गायब हो जाते हैं । जिस जघ्नय अपराध के लिए सजा -ए-मौत मिलनी चाहिए या कड़ी सजा जिससे औरों को सबक मिल सके कि किसी जान सस्ती नहीं जो लालच और रिश्वत की भेंट चढ़ जाए ।
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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