रफ्तार के जाल में फँसती ज़िंदगी

गंगा पाण्डेय
कुछ सप्ताह पहले उत्तर प्रदेश के आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर हुई एक भीषण सड़क दुर्घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। तेज रफ्तार वाहन के अनियंत्रित होकर पलटने से कई लोगों की मृत्यु हो गई और दर्जनों घायल हो गए। ऐसी घटनाएँ अब अपवाद नहीं रह गई हैं, बल्कि लगभग हर दिन देश के किसी न किसी हिस्से से सड़क हादसों की खबरें सामने आती रहती हैं। विडंबना यह है कि एक ओर भारत विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, आधुनिक राजमार्गों और एक्सप्रेसवे का जाल बिछाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों के मामले में भारत दुनिया के सबसे चिंताजनक देशों में गिना जाने लगा है।

 उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में सड़क दुर्घटनाओं में लगभग 1.68 लाख लोगों की मृत्यु हुई, 2023 में यह संख्या बढ़कर 1.72 लाख और 2024 में लगभग 1.88 लाख तक पहुँच गई। अर्थात प्रतिदिन पाँच सौ से अधिक लोग अपनी जान गंवा रहे हैं। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के उजड़ने और समाज की अपूरणीय क्षति की कहानी है।

भारत में सड़क दुर्घटनाओं का बढ़ता संकट केवल यातायात व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा हुआ प्रश्न है। हर दुर्घटना के पीछे कई कारण काम करते हैं, जिनमें चालक की लापरवाही, यातायात नियमों का उल्लंघन, खराब सड़कें, अपर्याप्त निगरानी और कमजोर प्रशासनिक व्यवस्था प्रमुख हैं। देश में मोटर वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है, लेकिन उसी अनुपात में सड़क सुरक्षा की संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है। लोग हेलमेट और सीट बेल्ट को सुरक्षा उपकरण की बजाय पुलिस चालान से बचने का माध्यम मानते हैं। परिणामस्वरूप छोटी-सी चूक भी कई बार जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन जाती है।

सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण तेज गति है। आधुनिक राजमार्गों और चौड़ी सड़कों ने वाहनों की गति तो बढ़ा दी है, लेकिन जिम्मेदार ड्राइविंग की भावना उतनी विकसित नहीं हुई। युवा वर्ग में विशेष रूप से तेज गति से वाहन चलाने को रोमांच और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाने लगा है। सोशल मीडिया पर स्टंट और रेसिंग के वीडियो इस प्रवृत्ति को और बढ़ावा देते हैं। जब वाहन निर्धारित गति सीमा से अधिक तेज चलता है, तब चालक के पास प्रतिक्रिया देने का समय कम हो जाता है और दुर्घटना की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। इसके अतिरिक्त शराब पीकर वाहन चलाना भी दुर्घटनाओं का एक गंभीर कारण है।
कानून इसके विरुद्ध कठोर है, लेकिन इसका प्रभावी क्रियान्वयन हर जगह नहीं हो पाता। कई बार देर रात होने वाली दुर्घटनाओं में पाया गया है कि चालक नशे की अवस्था में था। नशा व्यक्ति की निर्णय क्षमता और प्रतिक्रिया समय दोनों को प्रभावित करता है, जिससे दुर्घटना का जोखिम बढ़ जाता है। इसी प्रकार मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए वाहन चलाना भी आधुनिक समय की एक बड़ी चुनौती बन गया है। बातचीत, संदेश पढ़ने या सोशल मीडिया देखने में चालक का ध्यान सड़क से हट जाता है और कुछ ही सेकंड की असावधानी घातक सिद्ध हो सकती है।

सड़कों की भौतिक स्थिति भी इस संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। देश में अनेक स्थानों पर सड़कें गड्ढों से भरी हुई हैं, संकेतक बोर्डों का अभाव है, स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था अपर्याप्त है तथा मोड़ों और चौराहों पर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता। बरसात के मौसम में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। कई दुर्घटनाएँ सीधे तौर पर सड़क निर्माण की खराब गुणवत्ता और रखरखाव की कमी से जुड़ी होती हैं। यदि सड़कें सुरक्षित और वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप बनाई जाएँ तो दुर्घटनाओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
देश में पूरे वर्ष चुनावी रैलियाँ, सार्वजनिक सभाएँ, रोड शो और विभिन्न बड़े आयोजन होते रहते हैं। इन कार्यक्रमों के दौरान बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों को भीड़ नियंत्रण तथा सुरक्षा व्यवस्था में लगाया जाता है। परिणामस्वरूप यातायात नियंत्रण के लिए उपलब्ध मानव संसाधन कम पड़ जाते हैं। कई स्थानों पर राजमार्गों और व्यस्त सड़कों पर पर्याप्त ट्रैफिक पुलिस की अनुपस्थिति देखने को मिलती है। इससे नियमों का पालन कमजोर होता है और दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। यह स्थिति बताती है कि सड़क सुरक्षा को केवल पुलिस का विषय मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, बल्कि इसके लिए अलग और सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है।

सड़क दुर्घटनाओं का आर्थिक प्रभाव भी अत्यंत व्यापक है। विश्व बैंक की विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं से देशों को उनके सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा नुकसान के रूप में भुगतना पड़ता है। भारत में भी हर वर्ष लाखों लोग घायल होते हैं, जिनके उपचार पर भारी खर्च आता है। अनेक परिवारों का एकमात्र कमाने वाला सदस्य दुर्घटना में मृत्यु का शिकार हो जाता है, जिससे पूरा परिवार आर्थिक संकट में फँस जाता है। विकलांगता की स्थिति में व्यक्ति की आय क्षमता प्रभावित होती है और समाज पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।

इस प्रकार सड़क दुर्घटनाएँ केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक विकास के लिए भी बाधा हैं। सड़क सुरक्षा के सामाजिक आयाम भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। दुर्घटनाओं में मरने वालों का बड़ा हिस्सा युवाओं का होता है, जो देश की कार्यशील आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। जब कोई युवा असमय मृत्यु का शिकार होता है, तो उसके साथ अनेक सपने और संभावनाएँ भी समाप्त हो जाती हैं। परिवार मानसिक आघात से गुजरता है और बच्चों का भविष्य प्रभावित होता है। इसलिए सड़क सुरक्षा को जनस्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण के मुद्दे के रूप में भी देखा जाना चाहिए।

समस्या का एक बड़ा कारण यातायात नियमों के प्रति समाज का उदासीन रवैया भी है। अक्सर लोग लाल बत्ती पार करना, गलत दिशा में वाहन चलाना, ओवरलोडिंग करना और बिना लाइसेंस वाहन चलाना सामान्य बात समझते हैं। जब नियमों का उल्लंघन सामाजिक रूप से स्वीकार्य व्यवहार बन जाता है, तब कानून अकेले प्रभावी नहीं हो सकता। इसके लिए जन-जागरूकता, नैतिक शिक्षा और नागरिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना आवश्यक है। स्कूलों और कॉलेजों में सड़क सुरक्षा को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए ताकि बचपन से ही जिम्मेदार नागरिक तैयार किए जा सकें। सरकार ने हाल के वर्षों में कई सकारात्मक कदम उठाए हैं। मोटर वाहन अधिनियम में संशोधन कर जुर्मानों को बढ़ाया गया है, राष्ट्रीय राजमार्गों पर कैमरों और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी की व्यवस्था की जा रही है तथा "गुड समैरिटन" जैसी नीतियों के माध्यम से दुर्घटना पीड़ितों की सहायता करने वालों को कानूनी सुरक्षा प्रदान की गई है। इसके बावजूद अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं हो सके हैं क्योंकि कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन और जनसहभागिता में अभी भी कमी बनी हुई है।

वास्तव में सड़क दुर्घटनाओं की समस्या का समाधान बहुआयामी दृष्टिकोण में निहित है। सुरक्षित सड़कें, प्रशिक्षित चालक, कठोर कानून, आधुनिक तकनीक, पर्याप्त यातायात कर्मी, त्वरित चिकित्सा सहायता और जागरूक नागरिक, इन सभी की संयुक्त भूमिका आवश्यक है। साथ ही, चुनावी रैलियों, बड़े सार्वजनिक आयोजनों और अन्य प्रशासनिक गतिविधियों के बीच भी यातायात प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। सड़क सुरक्षा को विकास की अनिवार्य शर्त के रूप में स्वीकार करना होगा। अब यह समझना होगा कि सड़क दुर्घटनाएँ भाग्य या संयोग का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि अधिकांश मामलों में वे मानवीय भूलों और व्यवस्थागत कमियों का नतीजा होती हैं। यदि सरकार, प्रशासन और नागरिक समाज मिलकर जिम्मेदारी निभाएँ तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। विकास केवल नई सड़कें बनाने से नहीं, बल्कि उन सड़कों पर लोगों को सुरक्षित घर पहुँचाने से सिद्ध होता है। जब तक भारत अपनी सड़कों को सुरक्षित नहीं बना लेता, तब तक विकास की चमक के पीछे बिखरती ज़िंदगियों का यह दर्दनाक सच हमारे सामने खड़ा रहेगा।
(बाढ़, पटना)

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