चापलूसी का बोलबाला
- लक्ष्मीनारायण सेन
मोहन और सोहन दोनों परम मित्र है।एक दूसरे के बैगेर ये दोनों रहा नहीं करते। दोनों साथ साथ सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई एक ही कालेज में करते। दोनों के विचार राष्ट्रवाद था। दोनों जब भी खाली समय में बैठते तो देश समाज पर हो रही समकालीन घटनाओं पर चर्चा करते। चूंकि दोनों घर से सक्षम थे इस कारण किसी नौकरी के तरफ ध्यान नहीं दिये। दोनों अपना सिविल कंस्ट्रक्शन का काम प्रारंभ करता है।
अब दोनों मित्र एक राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण करता है। दोनों की पार्टी बैठक में आना जाना प्रारंभ हो जाता है ।दोनों बैठक में सकारात्मक अभिमत देता है।एक दिन एक योजना की निर्माण पर चर्चा हो रहा था तो पार्टी अध्यक्ष ने सबसे अपना अभिमत मांगा तो सभी ने अध्यक्ष के बातों का समर्थन किया पर, सोहन अपना तर्क के माध्यम से इस योजना को जनहितकारी में असंभव बताया। सोहन के बात से अध्यक्ष महोदय नाराज रहता है पर सोहन को कुछ कहता नहीं। मोहन का आदत चाटुकारिता प्रवृत्ति का होता है।कुछ दिन बाद पार्टी में विभिन्न पदों का नियोजन होता है जिसमें मोहन को सहसचिव का पद मिलता है पर सोहन को कोई पद नहीं दिया जाता फिर भी सोहन शांत रहता है और पार्टी और जनता के लिए कार्य करते रहता है।
कुछ बरस उपरांत स्थानीय निकाय की चुनाव की बारी आती है। यहां पर भी टिकट हेतु सोहन ठगा जाता है, और मोहन को पार्टी की ओर से उम्मीदवार घोषित कर दिया जाता है। सोहन का मन कुछ समय के लिए विचलित हो जाता है फिर शांत हो जाता है। अब चुनाव में सोहन को चार जोन का दायित्व दिया जाता है,सोहन खूब मेहनत करता है और चारों जोन की उम्मीदवार विजय भी हो जाता है।पर पार्टी अधिकांश सीट हार जाता हैं यहां तक की उनके मित्र मोहन भी हार जाता है। चुनाव के बाद चुनाव परिणाम की समीक्षा होती है। इस समीक्षा बैठक में सोहन अपने मन का भड़ास निकालता है सबके सब चुपचाप सुनता है। किसी के मुख से कोई जवाब नहीं निकलता क्योंकि सोहन के सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था।
चुनाव परिणाम के समीक्षा बैठक के बाद पार्टी के कुछ पदों का नियोजन होता है। इसमें सोहन को भी पद दिया जाता है पर यह पद उनके योग्यता के अनुकूल नहीं था क्योंकि यह पद कनिष्ठ सदस्य के लिए उपयुक्त था अतः सोहन पुनः ठगा जाता है और पद लेनें से मना कर देता है।बड़ी विडंबना थी उससे कनिष्ठ सदस्यों को उससे वजनदार पद दे दिया जाता है।सोहन थोड़ा नाराज होता है और शांत हो जाता है। चूंकि सोहन का उद्देश्य पार्टी का पद लेना या विधायक सांसद बनना नहीं था केवल उनका उद्देश्य राष्ट्र व जनता का सेवा करना था। अतः बिना पद के ही निष्ठापूर्वक सोहन राष्ट्र और जनसेवा का कार्य करता है।
(खुटेरी, गरियाबंद, छ.ग.)






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