अगले जनम मोहे मानुस न कीजो...!

- ललिता जोशी
मनुष्य का जन्म बड़ा अनमोल है। एक भजन भी है “मानुष जन्म अनमोल रे इसे माटी में न रोल रे, अब जो मिला है फिर न मिलेगा कभी नहीं’, कभी नहीं रे” । हिन्दू मान्यताओं के अनुसार 84 करोड़ योनियों के बाद मनुष्य का जन्म मिलता है । पृथ्वी पर जब -जब अत्याचार बढ़ा तो ईश्वर को भी पृथ्वी पर अत्याचार समाप्त करने के लिए मनुष्य की देह धारण करनी पड़ी । माना जाता है कि सृष्टि की जितनी भी रचनाएँ हैं उनमें मनुष्य सर्वश्रेष्ठ रचना है ।

आजकल के हालात देखकर लगता है कि मनुष्य का जन्म तो केवल दुर्घटनाओं की भेंट चढ़ने के लिए हुआ है । कहीं अवैध इमारतों के ढहने से लोग मरे, तो कहीं पर आग लगने से, कभी खुले नालों और गड्ढों में गिरने से,कभी मिलावटी जहरीली शराब से, तो कभी दवा और इलाज के अभाव में,कभी सड़कों पर शराब के नशे और ओवरस्पीडिंग के कारण । कहीं पर तो आम आदमी को अपने हक के पैसे लेने के लिए साक्ष्य के रूप में नरकंकाल लेकर आना पड़ा तो किसी को ठेले पर अपनी टूटी हड्डियाँ दिखाने के लिए बैंक के समक्ष हाजिर होना पड़ा । कभी जानवरों यानि कुत्ते, गाय, बाघ, हाथी, गुलदार का भोजन बन जाता है आम आदमी । ये हालत है आम आदमी की ।

आज सभी सिविक एजेंसियों की मिली भगत से आम आदमी  रोज ही अपनी जान हथेली पर लेकर चलता है । आदमी की जान हथेली पर रहती है । अब तो रोड रेज़ में भी आए दिन मनुष्य मरते ही रहतें हैं । इतना ही नहीं कभी जमीन के लिए तो कभी पैसों के लिए आपस में लड़ मरते हैं । कभी प्रेमी अपनी प्रेमिका को ही टुकड़े -टुकड़े कर डालता है,पत्नी पति को मार डालती है ,भाई -भाई के खून का प्यासा है तो सास-बहू को मरवाने के लिए पैंतरे अपनाती है । मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठ रचना लेकिन इसकी हरकतें निकृष्ट । आदमी मर जाये लेकिन सिस्टम के कान पर जूं नहीं रेंगती ।

अभी मालवीय नगर अग्निकांड की रिपोर्ट जो की तीन दिन में वो अभी भी कहीं अपने रास्ते में हैं । एक बात आज तक पल्ले नहीं पड़ी कि जब अवैध इमारतें ,होटल और अन्य अवैध बस्तियाँ ,अवैध गतिविधियां चलती हैं तो वो जब तक चलती ही रहती हैं जब तक की कोई बड़ा कांड न हो जाए । पैसा परमोधर्म है आज के सभ्य समाज के सभ्य मनुष्य के लिए । एक तरफ हम कहते हैं कि पैसा हाथ का मैल है । हम माया को महाठगिनी भी कहते हैं लेकिन अपनी सात पीढ़ियों के लिए संपत्ति जोड़ना भी हमारी संस्कृति का एक सच यानि काला सच है । जबकि अपने यहाँ कहावत भी है कि पूत कपूत तो क्यों धन संचय  और पूत सपूत तो क्यों धन संचय । लेकिन दिल है कि मानता नहीं ।
अपने देश में आम आदमी बहुत सी जगहों पर  कीड़े -मकोड़े की तरह रहता है ।

मेरा भारत वाकई महान है क्योंकि राजनेता ऐसे हादसों के बाद पीड़ितों के घर राजनीति करने पहुँच जाते हैं और सत्ताधारी दल चंद रुपयों का मुआवजा दे देता है । एक आदमी की जान की कीमत उसकी हैसियत से तय करी जाती है । अरे उस परिवार से पूछो जिसका सदस्य इस दुनिया से चला जाता है । एक आदमी की मृत्यु से एक ही झटके में कई रिश्ते उजड़ जाते हैं और परिवार को इस सदमें से उबरने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन परिवार बिखर जाता है ।किसी चीज को बनाने में एक उमर बीत जाती है लेकिन उजड़ने में एक सेकंड या मिनट में ।

वैसे तो ईश्वर की सभी रचनाएँ श्रेष्ठ हैं लेकिन इनमें मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि इसमें विवेक होता है । यही सामाजिक प्राणी भी है । अपने मनुष्य का विवेक तो इतना है कि वो कुत्तों की रक्षा के लिए तो मर मिटने के लिए तैयार रहते हैं चाहे वो बच्चों ,बुजुर्गों और आदमियों को काट -काट कर जान से मार ही डालें । कुत्ता स्वामिभक्त पशु है । चिटियों को प्रात:काल  लोग आटा डालते हुए मिल जाएंगे कुछ चिड़ियों और गिलहरियों ,कौओं को रोटी डालते हुए दिखाई पड़ जाएंगे वो भी बड़े प्यार से । गौशालाओं में धर्मभीरु लोग गायों को चारा खिलाते हुए मिल जाएंगे । मछलियों को भी दाना और आटे की गोलियां खिलाई जाती हैं । बंदरों को मंगलवार  और शनिवार को केले , चने खिलाये जाते हैं । कबूतरों को भी दाना डाला जाता है चाहे इन कबूतरों से  मानव जीवन के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव  डालता है ।

सरकार ने कबूतरों को दाना खिलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है और इसे तोड़ने वाले पर जुर्माना भी लगाया जाता है बावजूद इसके लोग इन्हें दाना डालते हुए नज़र आ जाएंगे। आजकल वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या से पता चल ही जाता है कि मनुष्य निस्वार्थ भाव से शायद ही कुछ करता हो । आप समझ रहे हैं ना ।  इतना ही नहीं हमारे देश में तो साँपों को भी दूध पिलाया जाता है । वन्य संरक्षण के लिए सरकारें प्रतिबद्ध और कटिबद्ध है ।

दिलचस्प बात ये है कि ऐसे परोपकारी मनुष्य अपने लालच के चलते अवैध तरीकों से धन कमाने में लगा रहता है । इसकी  झाँकियाँ  हम सभी ने अभी हाल ही देखी वो भी  देश  की राजधानी में । ये सब पूरे देश में रोजाना किसी न किसी प्रदेश में देखने को मिल जाती हैं । भैये ईश्वर से बिनती है कि  अगले जन्म मुझे मनुष्य न किजो !
(मुनिरका एन्क्लेव, दिल्ली)

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