डॉक्टर की पर्ची
हाल के दिनों में भारत सरकार ने खांसी के सिरप के लिए डाक्टर की पर्ची जरूरी कर दी है। दरअसल, छोटे-मोटे रोगों के उपचार के लिये मेडिकल स्टोर से दवा लेकर खाने की लोगों में आदत पायी जाती है। यह जाने बगैर कि घरेलू नीम-हकीमी जान को खतरे में भी डाल सकती है। कुछ समय पहले देश में बने सिरप के सेवन से बच्चों की मृत्यु से दवा उद्योग पर आंच आई थी।
यही वजह है कि खांसी व अन्य दवाओं के सिरप की बिना डॉक्टर की पर्ची के बिक्री पर रोक लगाने का फैसला सरकार को लेना पड़ा है। केंद्र सरकार के इस फैसले को सही समय पर लिया गया जरूरी कदम कहा जा सकता है। हाल की कुछ दुखद घटनाओं के घातक परिणामों के मद्देनजर लोगों को हर खांसी-जुकाम आदि छोटे-मोटे रोगों के लिये खुद दवा लेने की आदत से परहेज करना चाहिए। दरअसल, भारत में लंबे समय से ऐसी धारणा रही है कि ये सिरप आदि दवाइयां मौसमी बीमारियों के लिये नुकसान-रहित होती हैं।
लेकिन पिछले कुछ समय में हुई दुखद घटनाओं ने इनके अंधाधुंध प्रयोग और दवा निर्माण से जुड़े कमजोर नियमन को ही उजागर किया है। सरकार को ये कदम अनेक दुखद घटनाओं के सामने आने के बाद उठाना पड़ा है, जब इन दवाओं के उत्पादन में गंभीर खामियां सामने आईं। आम भारतीयों की आदत में शुमार है कि लोग अक्सर खांसी-बुखार की दवाइयां यह जाने बगैर सेवन करते हैं कि उनमें क्या-क्या मिला है। यह भी कि इनके उपयोग से हमारे शरीर में क्या-क्या साइड-इफेक्ट हो सकते हैं।
यह भी जानने की कोशिश नहीं होती है कि इन सिरप आदि को अन्य दवाओं के साथ लेने से क्या-क्या नकारात्मक प्रतिक्रिया हमारे शरीर में हो सकती है। लेकिन हकीकत यह भी है कि सिर्फ कठोर कानून बनाने मात्र से ही बेहतर परिणाम हासिल नहीं किए जा सकते हैं। भारत में पहले से ही दवाइयों की बिक्री के नियमन से जुड़े कानूनों की कमी नहीं है। इसके बावजूद डॉक्टर की पर्ची पर ही उपलब्ध होने वाली दवाइयां अक्सर बिना पर्याप्त जांच-पड़ताल के ही आसानी से मेडिकल स्टोरों में मिल जाया करती हैं।
दरअसल, असली चुनौती कानून का अनुपालन सख्ती से करने की होती है। जब तक देश में तमाम फार्मेसियों की नियमित जांच नहीं होती, कानून का उल्लंघन करने पर कड़े दंड का प्रावधान नहीं होता, तब नये नियम-कानून महज अच्छे इरादे वाले निर्देश मात्र बनकर रह जाएंगे। वास्तव में देश में दवा उत्पादक इकाइयों की नियमित निगरानी, राज्यों में सशक्त ड्रग-कंट्रोल अथॉरिटी, नियमित गुणवत्ता जांच के अलावा जन चेतना अभियान चलाने की सख्त जरूरत है। लोगों को बिना डॉक्टर के परामर्श के दवा लेने के खतरों से अवगत कराना होगा।





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