ई-कचरा प्रबंधन जरूरी
 इलमा अज़ीम 
ई-कचरे का उचित प्रबंधन पर्यावरण की सुरक्षा और मूल्यवान संसाधनों को बचाने के लिए बहुत जरूरी है। परंपरागत तरीके जैसे जलाना और असंगठित क्षेत्र में रीसाइक्लिंग करने से जहरीले तत्व निकलते हैं जो पर्यावरण और मजदूरों के स्वास्थ्य दोनों को नुकसान पहुंचाते हैं। भारत में लंबे समय तक ई-कचरे के लिए कोई अलग कानून नहीं था। 

औद्योगिक खतरनाक कचरे के लिए फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 का इस्तेमाल होता था। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 मुख्य कानून था जो पर्यावरण से जुड़े सभी मुद्दों को देखता था। इसके अलावा खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 1989 थे जो खतरनाक कचरे के निपटान और सीमा पार आवाजाही को नियंत्रित करते थे। लेकिन इनमें से कोई भी कानून खास तौर पर ई-कचरे के लिए नहीं बना था। इस व्यापक कानूनी ढांचे की कमी के कारण ही भारत को ई-कचरे के लिए अलग नियम बनाने की जरूरत पड़ी। 

ई-वेस्ट मैनेजमेंट नियम 2016 को भारत में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा इलेक्ट्रॉनिक कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने के लिए लाया गया था। 2011 के नियमों में विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व यानी ईपीआर तो लाया गया, पर उसे ठीक से परिभाषित नहीं किया गया और न ही सख्ती से लागू किया गया। उत्पादकों के लिए कलेक्शन का कोई तय लक्ष्य या निपटान और रीसाइक्लिंग की साफ जिम्मेदारी नहीं थी, जिससे कंपनियां बच निकलती थीं। 

असंगठित क्षेत्र पर कमजोर नियंत्रण के कारण वहीं सबसे ज्यादा ई-कचरा संभाला जाता था। खुलेआम जलाने और तेजाब से प्रोसेस करने जैसी खतरनाक विधियां आम थीं, जिनसे प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ीं। उपभोक्ताओं के लिए भी कोई सख्त नियम या जुर्माना नहीं था, इसलिए ई-कचरा घर के कचरे में ही फेंक दिया जाता था।

 इसके अलावा 2011 के नियम सिर्फ आईटी और टेलीकॉम उपकरणों पर लागू होते थे। घरेलू उपकरण और बाकी इलेक्ट्रॉनिक्स छूट गए थे, जिससे बहुत सारा ई-कचरा बिना प्रबंधन के रह गया। इन सभी कमियों को दूर करने के लिए 2016 के नियम लाए गए। बहरहाल, ई-कचरा प्रबंधन आज भारत की एक बड़ी समस्या है। मुख्य चुनौती लोगों में जागरूकता की कमी है।

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