हकीकत बनें दावे
राजीव त्यागी
महिलाओं को सशक्त बनाने के तमाम दावे किए जा रहे हैं, लेकिन इन दावों के बीच सामने आया एक कड़वा सच हमें वास्तविक स्थिति से रूबरू करा देता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 की रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि देश में ग्रामीण इलाकों में हर चौथी और शहरी क्षेत्र में हर छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती रही है।
यह ज्वलंत सवाल है कि जिन महिलाओं को सुप्रीम कोर्ट नेशन बिल्डर बता रहा है, उन्हें हम सुरक्षा नहीं दे पा रहे हैं। आखिर महिला सशक्तीकरण के सारे विशेष प्रयास सिर्फ कागजों तक ही क्यों सिमट जाते हैं? आखिर क्या वजह है कि महिलाओं की रक्षा-सुरक्षा हेतु तमाम विशेष कानून बनाये जाने के बावजूद जमीनी हकीकत नहीं बदलती है। सवाल यही है कि जीवन व्यवहार में स्थिति क्यों नहीं बदलती। देश के नीति-नियंताओं को इस गंभीर मुद्दे पर विचार करना होगा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिये तमाम विशेष कानून बनाये जाने के बावजूद क्यों ग्रामीण क्षेत्रों में हर चौथी व शहरी क्षेत्र में हर छठी स्त्री को हिंसा व यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ रहा है।
आखिर क्या वजह है कि घर से लेकर बाहर तक वे खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रही हैं? क्या कहीं इसमें पितृसत्ता प्रधान समाज की मानसिकता कारण है? दरअसल, आज लड़कियों व महिलाओं के खिलाफ हिंसा कई रूपों में मौजूद है। आजादी के सात दशक बाद भी हम दहेज के कलंक से मुक्त नहीं हो पाये हैं। हाल के दिनों में दहेज हत्या के कई बहुचर्चित मामले प्रकाश में आए। एक लड़की की पढ़ाई से लेकर शादी तक मां-बाप काफी खर्च करते हैं, फिर दहेज देने की जरूरत क्यों? छोटी-छोटी बातों में महिलाओं से मारपीट की खबरें आती हैं। वहीं अदिवासी व पिछड़े इलाकों में महिलाओं को डायन बताकर मारने की घटनाएं सामने आती हैं।
हमारा समाज आज भी अंधविश्वासों और जादू-टोने के भय से मुक्त नहीं हुआ है। जिसके चलते महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले सामने आते हैं। सर्वेक्षण का यह तथ्य चौंकाता है कि 18 से 49 आयु वर्ग की विवाहिताओं में बाईस फीसदी को वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा है। हालांकि, समय के साथ हिंसा के आंकड़ों में गिरावट आई है, लेकिन इसके बावजूद स्थिति चिंता पैदा करती है। जो किसी सभ्य समाज के माथे पर एक दाग की तरह ही है। हमारी व्यवस्था की विसंगतियां, पुरुष प्रधान सोच और हिंसा रोकने के लिये बनाए गए कानूनों के क्रियान्वयन में खामियां महिलाओं को पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराने में बाधक हैं, जो सामाजिक विसंगति की ओर इशारा करता है।





No comments:
Post a Comment