बॉटनी विभाग की वैश्विक उपलब्धि
डॉ. अमरीश सैनी ने खोजी शैवाल की नई प्रजाति Coelastrella fusifera
6 वर्षों का गहन अनुसंधान लाया रंग; शिवालिक की पहाड़ियों से मिली प्रदूषण मुक्ति की नई उम्मीद
मेरठ ।सीसीएसयू के बॉटनी विभाग ने विज्ञान की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार किसी शोधार्थी ने सूक्ष्म शैवाल (Microalgae) की एक बिल्कुल नई प्रजाति की खोज कर वैश्विक पटल पर मेरठ का नाम रोशन किया है। डॉ. अमरीश सैनी ने अपने 6 वर्षों के अथक परिश्रम और अटूट संकल्प के बल पर Coelastrella fusifera नामक प्रजाति को दुनिया के सामने पेश किया है।
पर्यावरण संरक्षण में क्रांतिकारी खोज
यह नई प्रजाति सहारनपुर स्थित शिवालिक पर्वत श्रृंखला की गोद से खोजी गई है। शोध के दौरान डॉ. सैनी ने पाया कि इसमें अद्भुत औषधीय गुणों के साथ-साथ 'वैल्यू ऐडेड प्रोडक्ट्स' (Value Added Products) का भंडार है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. सैनी ने अपने पीएच.डी. शोध के दौरान इसे एक शक्तिशाली बायोरेमेडीएशन एजेंट (Bioremediation Agent) के रूप में सफलतापूर्वक परीक्षित किया है। यह प्रजाति जल स्रोतों से विषैले प्रदूषकों को सोखने में वर्तमान में उपलब्ध अन्य प्रजातियों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध हुई है।
एक शोधार्थी के लिए अपनी मेहनत को वैश्विक ज्ञान-कोश में दर्ज होते देखना सबसे गौरवशाली क्षण होता है। यह सफलता केवल मेरी नहीं, बल्कि मेरे गुरुजनों के मार्गदर्शन और विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई सुविधाओं की जीत है। मेरा मानना है कि यदि लक्ष्य नेक हो और परिश्रम कठिन, तो सफलता निश्चित है। -डॉ. अमरीश सैनी
प्रतिष्ठित संस्थानों का मिला सहयोग
इस शोध की वैज्ञानिक प्रमाणिकता और जटिलता को सिद्ध करने में देश के शीर्ष संस्थानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। इसमें IIT कानपुर, IIT रुड़की, BBS बेंगलुरू और कुछ अन्य विशेषज्ञों ने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता साझा की है।
मार्गदर्शकों के प्रति जताया आभार
डॉ. सैनी ने अपनी इस ऐतिहासिक शोध-यात्रा में मिले विशेष मार्गदर्शन के लिए निम्नलिखित व्यक्तित्वों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त किया है:
डा रमाकांत (शोध-निर्देशक): जिनके कुशल नेतृत्व में इस शोध ने वैज्ञानिक धरातल पर आकार लिया। डॉ. रमाकांत ने इस कार्य को ऐतिहासिक बताया तथा कहा कि भविष्य में छात्र 'विकसित उत्तर प्रदेश, उन्नत भारत' की मुहिम पर और तेजी से काम करेंगे।
प्रो विजय मलिक: जो B.Sc. (स्नातक) काल से ही डॉ. सैनी के प्रेरणा स्रोत और गुरु रहे हैं। उन्होंने इस शोध पत्र को वैज्ञानिक नियमावली के अनुसार तैयार कराकर इसे वास्तविक रूप देने में मुख्य भूमिका निभाई है।
डा. ज्योति सिंह ने प्रयोगशाला परीक्षणों और शोध-पत्र के कार्यों के दौरान डॉ. सिंह ने इस प्रजाति के प्रदूषण नियंत्रण गुणों का विभिन्न तरीकों से बारीकी से विश्लेषण करने में डॉ. सैनी का सीधा सहयोग किया।
नरलिप कौर ने शोध-पत्र को लिखित रूप में तैयार करने में अमूल्य सहायता प्रदान की तथा इस स्पीशीज के कई अन्य वैज्ञानिक पहलुओं का बारीकी से अध्ययन करने में मदद की।
भविष्य की राह
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान समय में जब जलवायु परिवर्तन के कारण कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं, ऐसे में एक नई प्रजाति की पहचान करना वैश्विक स्तर पर भारतीय शोधार्थियों की मेधा और जीवंतता को दर्शाता है। यह शोध अब अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित होकर सार्वजनिक हो चुका है {Digital Object Identifier (DOI): 10.21608/ejbo.2026.358447.3180}, जिससे भविष्य में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ औद्योगिक और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी नए अनुसंधान के द्वार खुलेंगे।


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