मिटानी होगी घाटी से आतंक की आखिरी परछाई

- योगेश कुमार गोयल
भारत का इतिहास एक ओर जहां अध्यात्म, विविधता और समरसता की भूमि का रहा है, वहीं दूसरी ओर इसने अतीत और वर्तमान में अनेक आंतरिक और बाहरी संकटों का सामना भी किया है। इन संकटों में सबसे भयावह है आतंकवाद, जिसने न केवल देश की सुरक्षा व्यवस्था को लगातार चुनौती दी है बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी झकझोरा है। आतंकवाद कोई सीमित भूभाग का संकट नहीं है बल्कि यह समूचे राष्ट्र की चेतना को आहत करने वाला संकट है। भारत ने सैन्य, कूटनीतिक, सामाजिक और वैचारिक मोर्चों सहित बहुस्तरीय स्तर पर दशकों तक इस समस्या का सामना किया है।
आतंकवाद के विरूद्ध जागरूकता फैलाने और शांति एवं सद्भाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 21 मई को ‘राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस’ मनाया जाता है। 21 मई को मनाया जाने वाला यह दिवस न केवल इस संघर्ष की स्मृति है बल्कि यह ऐसी प्रतिज्ञा का दिन भी है, जो यह दर्शाती है कि भारत आतंकवाद को किसी भी रूप में सहन नहीं करेगा।
कश्मीर घाटी आतंकवाद के विरुद्ध भारत के सबसे लंबे, संवेदनशील और निर्णायक संघर्ष की साक्षी रही है। कभी अपनी अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता, सूफी परंपराओं, सांस्कृतिक समृद्धि और ‘धरती के स्वर्ग’ की पहचान के लिए विख्यात यह घाटी पिछले तीन दशकों तक आतंक, रक्तपात और अस्थिरता के भयावह दौर से गुजरती रही। वर्ष 1990 के बाद जिस सुनियोजित तरीके से घाटी में कट्टरपंथ और आतंकवाद की जड़ें जमाई गई, वह केवल स्थानीय असंतोष नहीं बल्कि सीमापार रची गई एक गहरी साजिश का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य भारत की एकता, अखंडता और सामाजिक समरसता को चोट पहुंचाना था। इस दौर ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया, अनगिनत मासूमों की जिंदगी छीन ली और पूरी पीढ़ी को भय, असुरक्षा और हिंसा के साए में जीने के लिए विवश कर दिया। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि घाटी में अब तक हुई हजारों आतंकी घटनाओं में लगभग 42 हजार लोगों की जान जा चुकी है, जिनमें निर्दोष नागरिक, सुरक्षाबलों के वीर जवान और आतंकवादी शामिल हैं।
दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 से 2024 के बीच घाटी में 22,143 छोटे-बड़े आतंकी हमले दर्ज किए गए, जिनमें 4,981 आम नागरिकों की मौत हुई जबकि मातृभूमि की रक्षा करते हुए 3,624 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। इसी दौरान भारतीय सेना और सुरक्षा बलों ने अदम्य साहस और रणनीतिक क्षमता का परिचय देते हुए 24,512 आतंकवादियों को मार गिराया। यह केवल आंकड़े नहीं बल्कि उन वीर जवानों के अद्वितीय शौर्य, बलिदान और राष्ट्रनिष्ठा की गाथा हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश की सुरक्षा सुनिश्चित की। हालांकि बीते एक दशक में भारत की आतंकवाद विरोधी नीति अधिक आक्रामक, तकनीक-सक्षम और रणनीतिक रूप से प्रभावी हुई है।
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2004 से 2014 के बीच देशभर में 7,217 आतंकी हमले हुए थे जबकि वर्ष 2014 से 2024 के बीच यह संख्या घटकर 2,242 से भी कम रह गई। इस दौरान आतंकी हिंसा से होने वाली जनहानि में 70 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई। आम नागरिकों की मौतों में 81 प्रतिशत और सुरक्षाकर्मियों की शहादतों में लगभग 50 प्रतिशत की गिरावट इस बात का स्पष्ट संकेत है कि भारत की मजबूत सुरक्षा रणनीति, सशक्त खुफिया तंत्र और ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति ने आतंकवाद की कमर तोड़ने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।

हालांकि आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि आतंकवाद की चुनौती कितनी गहन और विस्तृत है तथा इससे निपटने के लिए भारत को कितनी रणनीतिक गहराई के साथ काम करना पड़ रहा है। 2025 के पहलगाम हमले से इतर देखें तो घाटी में हाल के वर्षों में सामान्य जीवन की बहाली का प्रमाण यही है कि आज वहां के युवा बंदूक नहीं, किताबों की ओर लौट रहे हैं। स्कूलों में छात्रों की उपस्थिति बढ़ी है, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में दाखिलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और पर्यटन के क्षेत्र में भी आशाजनक वृद्धि देखी गई है। रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी ने युवाओं को एक वैकल्पिक जीवन की राह दिखाई है। इन संकेतों से स्पष्ट है कि आतंक केवल सैन्य शक्ति से नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास से भी पराजित किया जा सकता है। घाटी की जनता अब समझ चुकी है कि आतंक का मार्ग केवल विनाश की ओर ले जाता है जबकि शिक्षा, रोजगार और शांति समृद्धि की ओर।

लेकिन इस यात्रा में अब भी चुनौतियां शेष हैं क्योंकि पाकिस्तान अब भी दोहरी नीति अपनाए हुए है, एक ओर शांति की बातें, दूसरी ओर आतंकवाद को समर्थन। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों को आज भी आईएसआई का समर्थन प्राप्त है। इस परिस्थिति में भारत की आतंकवाद के प्रति नीति और भी कठोर और स्पष्ट हो गई है, आतंकवाद के प्रति शून्य सहनशीलता। यह नीति केवल वक्तव्य नहीं बल्कि क्रियान्वयन की दृढ़ रणनीति है। सीमा पर सैटेलाइट निगरानी, ड्रोन तकनीक, सुरक्षाबलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करना और नागरिक-सैन्य समन्वय को सशक्त करना इस नीति के कार्यान्वयन के मुख्य स्तंभ हैं।
भारत अब यह भी समझता है कि आतंकवाद केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं है बल्कि एक वैचारिक लड़ाई भी है। यह युवा मन को भ्रमित करके उसे हिंसा की ओर ले जाने का प्रयास करता है। ऐसे में शिक्षा, सामाजिक समरसता और संस्कृति का पुनर्प्रतिष्ठान आवश्यक है। घाटी में यदि शांति को स्थायी बनाना है तो केवल सैन्य दबाव नहीं बल्कि मनोवैज्ञानिक और वैचारिक प्रयास भी अत्यंत आवश्यक हैं। युवाओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि राष्ट्र निर्माण का मार्ग केवल प्रतिभा, परिश्रम और सकारात्मक सोच से ही बनता है। उन्हें यह बताना होगा कि बंदूकें केवल बर्बादी लाती हैं जबकि किताबें भविष्य बनाती हैं।
आज जब भारत राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी दिवस मना रहा है तो यह दिन केवल शोक या स्मरण का दिन नहीं है बल्कि यह एक सतत संकल्प का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि आतंक से लड़ाई केवल सेना की नहीं है अपितु यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। जब समाज के हर वर्ग, बुद्धिजीवी, युवा, महिला, किसान, व्यापारी इस संघर्ष में भागीदार बनते हैं, तभी आतंक की जड़ें हिलती हैं।

भारत जिस दिशा में बढ़ रहा है, वहां यह विश्वास किया जा सकता है कि वह दिन अब दूर नहीं, जब कश्मीर घाटी एक बार फिर से केवल चिनार की छांव, झीलों की शांति और सूफी संगीत की मिठास के लिए जानी जाएगी। यह तभी संभव है, जब आतंक की आखिरी परछाई भी मिटा दी जाए और एक साझा संकल्प, साझा रणनीति और साझा कार्रवाई के बल पर एक शांत, समृद्ध और एकजुट भारत का निर्माण हो। पेज के लेख (21-05-26)


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