युवाओं की पीड़ा समझें
राजीव त्यागी
पिछले कुछ दिनों से अचानक कॉकरोच यानी तिलचट्टा देश में चर्चा का विषय बन गया है। नहीं, कॉकरोच ने कुछ नया नहीं किया है। हुआ यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत के मुखिया ने एक मामले की सुनवाई के दौरान अपनी अलिखित टिप्पणी में कॉकरोच का नाम लेकर कुछ ऐसा कह दिया कि देशभर में चर्चा चल पड़ी है।
मामला एक वकील द्वारा ‘वरिष्ठ वकील’ कहलाये जाने की मांग को उठाये जाने का था। उसकी मांग को अनुचित बताते हुए मुख्य न्यायाधीश महोदय ने उस जैसे वकीलों की तुलना कॉकरोच से कर दी। उन्होंने कहा, कुछ बेरोज़गार युवा काॅकरोच जैसे होते हैं जो बाद में मीडिया, सोशल मीडिया या आरटीआई एक्टिविस्ट आदि बनकर सिस्टम पर हमला करने लगते हैं। मुख्य न्यायाधीश तो यह टिप्पणी करके चुप हो गये थे, पर इस टिप्पणी को लेकर देश बोलने लगा। बेरोज़गारों, एक्टिविस्टों, मीडिया कर्मियों, ने मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी को अनुचित ही नहीं, शर्मनाक भी बताया।
सचमुच, यह समझना आसान नहीं है कि देश के सर्वोच्च पदों में से एक पर बैठने वाला व्यक्ति देश के युवाओं की तुलना काॅकरोच जैसे जीव कैसे कर सकता है! आज यदि देश के मुख्य न्यायाधीश द्वारा युवाओं को कॉकरोच कहे जाने पर आपत्ति है तो उसके पीछे उस मानसिकता के नकार की प्रवृत्ति है जो परजीवी को एक गाली के रूप में देखती है। देश के बेरोजगारों को परजीवी मानने-कहने का मतलब देश के एक करोड़ से अधिक युवाओं को नाकारा बतलाना है। उनका अपराध या पाप यही है कि हमारी व्यवस्था उन्हें रोजगार नहीं दे पायी।
अंतर्राष्ट्रीय श्रम आयोग और मानव विकास संस्थान के एक सर्वेक्षण के अनुसार पंद्रह से उन्तीस वर्ष की आयु वर्ग में आने वाले भारतीय युवाओं में 83 प्रतिशत बेरोज़गार हैं। इन बेरोज़गारों में से 67 प्रतिशत युवा स्नातक हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि सन् 2000 की तुलना में आज यह संख्या दुगनी हो चुकी है। तब 35 प्रतिशत युवा बेरोज़गार थे, आज 65 प्रतिशत से अधिक युवा रोज़गार की तलाश में भटक रहे हैं। आखिर क्यों? इस स्थिति के लिए कौन जिम्मेदार है? किसका दायित्व है इन युवाओं को रोज़गार देना? फिर, जब इन युवाओं में से कुछ आर टी आई कार्यकर्ता बन जाते हैं, मीडियाकर्मी के रूप में काम करने लगते हैं या व्यवस्था के प्रति अपना गुस्सा अभिव्यक्त करते हैं तो उन्हें परजीवी कॉकरोच कहा जाता है! आखिर क्यों?





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