व्यवस्था में सुधार जरूरी

इलमा अज‍़ीम 
नीट यूजी 2026 की परीक्षा रद्द हो गई। यह बात किसी के लिए मामूली लग सकती है, लेकिन उन होनहार बच्चों से पूछिए जिन्होंने जीतोड़ मेहनत करके तैयारी की थी। बहरहाल परीक्षा को रद्द होना था हुई। लेकिन नीट जैसे मामलों में सबसे चिंताजनक तथ्य केवल यह नहीं कि कोई एक घटना घट गई, बल्कि यह है कि ऐसी घटनाएँ बार-बार क्यों सामने आती हैं। 

जब कोई राष्ट्रीय परीक्षा संदेह के घेरे में आती है, तो पूरा सार्वजनिक विश्वास डगमगाने लगता है। विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षक, कोचिंग संस्थान और प्रशासन- सभी एक ऐसे प्रश्न से जूझते हैं जिसका उत्तर केवल प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं मिल सकता। प्रश्न यह है कि क्या हमारी परीक्षा-व्यवस्था वास्तव में इतनी मजबूत है कि वह पारदर्शिता, निष्पक्षता और सुरक्षा—तीनों मोर्चों पर एक साथ टिक सके? यदि नहीं, तो समस्या केवल एक परीक्षा की नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की है। परीक्षा-व्यवस्था का संकट अचानक पैदा नहीं होता। यह उन छोटी-छोटी कमजोरियों से बनता है जिन्हें समय रहते ठीक नहीं किया जाता। प्रश्नपत्र निर्माण की प्रक्रिया, गोपनीय सामग्री का संरक्षण, लॉजिस्टिक ट्रांसपोर्ट, परीक्षा केंद्रों की निगरानी, तकनीकी सत्यापन, पहचान-प्रक्रिया और उत्तर-पत्रों की हैंडलिंग—इन सभी स्तरों पर यदि एक भी कड़ी कमजोर हो जाए, तो पूरी व्यवस्था संदेह के घेरे में आ सकती है। 

आधुनिक समय में परीक्षा केवल कागज और कलम का आयोजन नहीं रह गई है; वह सूचना, सुरक्षा और नियंत्रण के अत्यंत जटिल नेटवर्क से जुड़ी प्रणाली बन चुकी है। इसलिए किसी भी स्तर पर हुई लापरवाही का सीधा प्रभाव छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। यह भी समझना होगा कि परीक्षा-प्रणाली में भरोसा केवल पारदर्शिता से नहीं बनता, बल्कि निरंतरता से बनता है। यदि विद्यार्थी को यह आश्वासन न हो कि उसकी मेहनत का मूल्य स्थिर और सुरक्षित है, तो उसकी तैयारी अनिश्चितता में बदल जाती है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा जैसी परीक्षा में यह चिंता और अधिक गंभीर हो जाती है, क्योंकि यह केवल एक पेशेवर प्रवेश-परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के सामाजिक-आर्थिक सपनों का केंद्र है। ग्रामीण क्षेत्रों के छात्र, निम्न-मध्यम वर्ग के अभ्यर्थी और छोटे शहरों के युवा सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी योग्यता के बल पर आगे बढ़ने का सपना देखते हैं। लेकिन जब परीक्षा की शुचिता पर प्रश्न उठते हैं, तब सबसे अधिक नुकसान इन्हीं विद्यार्थियों का होता है।  परीक्षा का भविष्य ही संदिग्ध हो जाए, तो मानसिक दबाव कई गुना बढ़ जाता है।

 कुछ विद्यार्थी हताश हो जाते हैं, कुछ अपनी रणनीति बार-बार बदलते हैं, और कुछ गहरे अवसाद में भी चले जाते हैं। इसलिए परीक्षा-प्रशासन को यह समझना चाहिए कि वह केवल तिथियाँ घोषित करने या केंद्र स्थापित करने का काम नहीं कर रहा, बल्कि युवाओं के भविष्य का भरोसा संभाल रहा है। परीक्षा-व्यवस्था में सुधार के लिए सबसे पहले जवाबदेही तय करनी होगी। जब कोई परीक्षा विवाद में आती है, तो अक्सर ध्यान केवल घटना पर केंद्रित रहता है। लेकिन असली प्रश्न यह है कि उस घटना की अनुमति किसकी लापरवाही से मिली। जवाबदेही का अर्थ केवल किसी एक अधिकारी को हटाना नहीं, बल्कि पूरे ढाँचे का पुनर्मूल्यांकन करना है। यदि दोषी पकड़े नहीं जाते, प्रक्रिया की कमियाँ सार्वजनिक नहीं होतीं और सुधारात्मक कदम नहीं उठाए जाते, तो हर बार वही संकट दोहराया जाएगा।

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