महंगाई से त्रस्त आम आदमी
इलमा अज़ीम
पेट्रोल व डीजल तथा सीएनजी के दामों में वृद्धि ने आम आदमी को व्यथित कर दिया है। जाहिर है पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि से न केवल यातायात महंगा हो जाता है बल्कि मालभाड़ा बढ़ने से हर चीज के दामों में उछाल आ जाता है। वहीं रोजमर्रा का सामान बनाने वाली कंपनियां दुहाई दे रही हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि से उनकी उत्पादन लागत में दस से बीस फीसदी की वृद्धि हुई है।
आम उपभोक्ता को अभी और महंगाई को झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह भी एक हकीकत है कि रुपये के गिरते मूल्य ने भी कीमतें बढ़ाने का दबाव बनाया है। कंपनियां अपना मुनाफा बनाये रखने के लिये कीमतें बढ़ाने और पैकेटबंद उत्पादों की मात्रा घटाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। आशंका जतायी जा रही है कि पेट्रोल व डीजल के दामों में तीन-तीन रुपये की वृद्धि के बाद टेलीकॉम कंपनियां रिचार्ज प्लान बढ़ा सकती हैं। उनका दावा है कि मोबाइल टाॅवर को चलाने में आने वाला 40 फीसदी खर्च सिर्फ पेट्रोल और बिजली पर होता है।
प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन की खपत को कम करने के आह्वान के कुछ दिन बाद ही पेट्रोल, डीजल व सीएनजी के दामों में बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी चार साल से अधिक समय में पहली बार की गई है। निस्संदेह, खाड़ी संकट से उपजे हालात में कीमतों में यह वृद्धि अनिवार्य लग रही थी। माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु आदि राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के चलते ही सरकार ने यह कदम देर से उठाया है। चुनाव परिणाम आने के बाद जब हैदराबाद में प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ईंधन खपत में कटौती करने का आगाह किया था, तो संकेत माना गया कि पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि हो सकती है।
सरकार ने तेल विपणन कंपनियों को हो रहे भारी नुकसान की ओर इशारा करते हुए मूल्य वृद्धि का बचाव किया है। लेकिन हकीकत यही है कि करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवार, किसान व छोटे व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए बढ़ी ईंधन दरें जल्दी ही भोजन, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं को महंगा बना देती हैं। जीवनावश्यक वस्तुओं की कीमतों ने सभी रिकार्ड तोड़ते हुए गरीबों की कमर भी तोड दी है। आम आदमी का जीना दूभर होता जा रहा है। उसके सामने दो वक्त की रोटी जुटाने तक का संकट खड़ा हो गया है। दाल-रोटी को तो गरीब से गरीब आदमी का भोजन समझा जाता था परन्तु अब तो दाल-रोटी के लिए भी आम आदमी तरस रहा है।





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