बेटियां बचें कैसे ?
इलमा अज़ीम
इन दिनों त्विशा शर्मा का केस चर्चा में है। पिछले कुछ सालों से तो लगता था कि अब देश में बहुत बदलाव हो गया है। शादियां समानता के आधार पर हो रही हैं। इसका बड़ा कारण लगता कि चूंकि लड़कियां पढ़-लिख गई हैं, तो वे स्वयं भी ऐसे युवकों से विवाह करने से मना कर देती हैं, जिनके परिवार उन्हें अपने अनुकूल नहीं लगते। अक्सर हम मध्यवर्ग के लोग हर बात अशिक्षा से जोड़ देते हैं कि फलां ने ऐसा इसलिए किया होगा कि परिवार शिक्षित नहीं था। उसकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी।
लेकिन त्विशा के मामले पर नजर डालें, तो उसके ससुराल में सब पढ़े-लिखे थे। सास रिटायर्ड जज, पति आपराधिक मामलों का वकील। फिर भी जब इस लड़की ने आत्महत्या कर ली। यही नहीं इसकी पहली सूचना उसके परिवार वालों काे नहीं दी गई, बल्कि सास अपने जान-पहचान वालों से बातचीत करती रही।सोचने की बात है कि शादी करते ही आखिर लड़कियों के ऊपर ही सारा बोझ क्यों लाद दिया जाता है।
इन दिनों ऐसे वीडियोज और रील्स की भरमार है, जिनमें ऐसा न करने पर पत्नी को पति घर से निकालने और तलाक की धमकी देते पाए जाते हैं। आखिर लड़कियां ही क्यों घर से निकाली जाएं। वे ही क्यों तरह-तरह के लांछन झेलें। यदि प्रतिवाद करें, तो मारी जाएं और यदि चुपचाप सहती रहें, तो खुद जान दे दें। आज भी बेटियों की तो किस्मत में ही ये लिखा है कि अपने घरों में वे जन्म से पहले ही भाई की चाहना में प्राण गंवाएं और ससुराल चली जाएं, तो न जाने कितने आरोप और वधिक उनके लिए तलवार लिए बैठे हैं।
इन दिनों जब शहरी परिवारमात्र एक-दो बच्चों तक ही सीमित हैं, तब बेटियों की शिक्षा-दीक्षा पर भी बेटे की तरह ही खर्च होता है, लेकिन अब भी वे दोयम दर्जे की नागरिक हैं और हम जोरशोर से नारा लगाते हैं कि बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ।





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