मंडी में बिकते युवाओं के सपने
कवलजीत सिंह
भारत युवाओं का देश है, यहां करोड़ों छात्र अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात कठिन परिश्रम करते हैं। कोई डाक्टर बनना चाहता है, कोई इंजीनियर, कोई प्रशासनिक अधिकारी तो कोई वैज्ञानिक। इन सपनों को साकार करने का सबसे बड़ा माध्यम प्रतियोगी परीक्षाएं हैं, इसमें दो राय नहीं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश में जिस प्रकार परीक्षा प्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़े हुए हैं, उससे युवाओं का विश्वास डगमगाने लगा है।
हाल ही में नीट परीक्षा को लेकर सामने आए विवाद और कथित पेपर लीक की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं है, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जुड़ा गंभीर विषय है।किसी किसान का बेटा खेतों की मेड़ पर बैठकर पढ़ता है, किसी मजदूर की बेटी लालटेन की रोशनी में नोट्स तैयार करती है, तो कोई मध्यमवर्गीय परिवार अपनी जमा पूंजी कोचिंग संस्थानों की फीस में झोंक देता है। माता-पिता अपने सपनों को बच्चों की आंखों में बसाकर हर कठिनाई सह लेते हैं। इसलिए परीक्षा को केवल एक सामान्य कार्य समझना बहुत बड़ी मूर्खता होगी।
परीक्षा और परिणाम किसी भी शिक्षा व्यवस्था के आधार माने जाते है, यदि परीक्षा का आधार ऐसी धांधली और अनियमितताओं के बलबूते टिका हो तो उसका परीक्षा परिणाम भले ही देखने में ठीक लगता हो, मगर सामाजिक परिणाम कभी भी सकारात्मक नही हो सकता। वहीं जब नीट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पर पेपर लीक, धांधली और अनियमितताओं के आरोप लगते हैं, तब केवल प्रश्नपत्र ही लीक नहीं होता, बल्कि व्यवस्था पर विश्वास भी डगमगाता है। यह पहली बार नहीं है जब किसी राष्ट्रीय परीक्षा की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा हो, परंतु हर बार की तरह इस बार भी सबसे अधिक आहत वही छात्र हुए हैं, जिनका इस पूरे खेल से कोई लेना-देना नहीं था।
विभिन्न राज्यों में समय-समय पर भर्ती परीक्षाओं और प्रवेश परीक्षाओं में धांधली सामने आ रही है। कभी वॉट्सऐप पर पेपर वायरल होता है, कभी सॉल्वर गैंग पकड़े जाते हैं, तो कभी परीक्षा केंद्रों की मिलीभगत सामने आती है। प्रश्न यह है कि इतनी संवेदनशील परीक्षाओं में बार-बार सुरक्षा में सेंध कैसे लग जाती है? क्या हमारी तकनीक कमजोर है या व्यवस्था में बैठे कुछ लोग ही इस खेल का हिस्सा बन चुके हैं? राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि देश की प्रमुख परीक्षाओं को निष्पक्ष, पारदर्शी और तकनीकी रूप से सुरक्षित बनाया जा सके।
लेकिन यदि बार-बार परीक्षाओं पर सवाल उठ रहे हैं, तो यह एजेंसी की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न है। एक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसका विश्वास होता है। जब वही डगमगाने लगे, तो केवल प्रेस कॉन्फ्रेस और जांच समितियां लोगों का भरोसा वापस नहीं ला सकतीं। छात्र यह महसूस करने लगते हैं कि हमारी व्यवस्था में ईमानदारी और परिश्रम का कोई मूल्य नहीं है, यह भावना समाज के लिए अत्यंत खतरनाक है।





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