आम लोगों की मदद से लगा डाले 2.5 करोड़ से ज्यादा पेड़
'पीपल की छांव' से समझते अब बता रहे अनुभव
नयी दिल्ली। पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन ने लगभग पांच दशक तक जमीनी स्तर पर काम करके 2.70 लाख हेक्टेयर में पेड़ लगाकर वनस्पति को पुनर्स्थापित किया और ढाई करोड़ से ज्यादा पेड़ लगाए। अब वह अपने अनुभवों को किताब के जरिए लोगों के सामने लाए हैं। उन्होंने राजस्थान, उत्तराखंड, यूपी समेत कई राज्यों में धरती को बचाने की मुहिम के चलते हरियाली फैलाई है। इस किताब में उन्होंने यह भी बताया है कि उन्होंने बजट को कैसे मैनेज किया और छाया का अर्थशास्त्र क्या है।
उनका कहना है कि अगर आप उस छाया के मूल्य का आकलन करेंगे, तो हैरान रह जाएंगे। पेड़ की छांव न केवल सड़क किनारे काम करने वाले रेहड़ी, पटरी वालों को धूप और बारिश से बचाती है, बल्कि उनके लिए एक मुफ्त 'वर्कस्पेस' भी देती है। एक छायादार पेड़ की छांव से एक विक्रेता को प्रतिदिन का किराया लगभग 200 रुपये प्रतिदिन देने से मुक्ति मिल जाती है। इस तरह सालाना करीब 72,000 रुपये की बचत होती है।
उन्होंने बताया कि इसके लिए उन्होंने क्राउड फंडिंग की मदद ली। उनके दानदाता धनी अभिजात वर्ग नहीं थे, बल्कि देश के आम लोग थे, जैसे— ऑटो-रिक्शा चालक, टैक्सी चालक, डिलीवरी बॉय, बैंक क्लर्क, सरकारी कर्मचारी, शिक्षक, कारखाना कर्मचारी, किसान, दुकानदार और साथी स्वयंसेवक। किसी ने 10 रुपये का दान दिया, किसी ने लंच बॉक्स और किसी ने अपने रविवार की सुबह का समय। कई लोगों ने पुरानी साइकिलें, स्कूटर या मोटरसाइकिलें दान कीं, जो पौधे, खाद और औजार ले जाने का सबसे व्यावहारिक और प्रिय साधन बन गईं। कुछ लोग साइट पर हमारी टीम के लिए चाय और बिस्कुट लाए। कुछ लोग चुपचाप खड़े होकर ताली बजाते रहे या हौसला बढ़ाते रहे। हर छोटा-सा प्रयास मायने रखता है। दान की बाल्टी कभी खाली नहीं हुई, क्योंकि हर कोई अपना योगदान देता रहा।
कभी-कभी दानदाता हमें गाय दान में देते थे, दान के लिए नहीं, बल्कि समझदारी से। गाय का गोबर हमारे लिए एक अनमोल खजाना रहा है। वैज्ञानिक तरीके से सुखाकर और संसाधित करने पर यह अधिकांश रासायनिक प्रक्रियाओं की तुलना में खराब हो चुकी मिट्टी को बेहतर बनाता है। आस-पड़ोस से आने वाला कृषि अपशिष्ट, रसोई अपशिष्ट और उद्यान अपशिष्ट हमारे केंद्रों तक पहुंचाया गया। हमने खाद के ढेर बनाए, उन्हें प्यार से पलटा और ह्यूमस का निर्माण किया, जिससे नए जंगलों का जन्म हुआ।
पीपल बाबा बताते हैं कि नानी की बदौलत उनका उत्तराखंड के जंगलों, कॉर्बेट, राजाजी, हरिद्वार, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, टिहरी, उत्तरकाशी, नैनीताल और अल्मोड़ा से परिचय हुआ। उनके छोटे परिवार का तबादला हिमाचल प्रदेश के डलहौजी में हो गया। कैंब्रियन हॉल स्कूल उनकी पहली औपचारिक कक्षा बनी। उससे पहले उन्होंने कोलकाता, डलहौजी और चंडीगढ़ में एक-एक साल पढ़ाई की थी। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को एक किताब 'पीपल की छांव' में उतारा है। यह चर्चित किताब पेंग्विन प्रकाशन के द्वारा लॉन्च की जा रही है और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अमेजन आदि पर मिलेगी। उनका कहना है कि पर्यावरणीय परिवर्तन केवल संस्थानों या नीतियों से शुरू नहीं होता, बल्कि यह साधारण नागरिकों से शुरू होता है, जो कार्य करने का निर्णय लेते हैं।


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