जिम्मेदारी समझें लोग
राजीव त्यागी
शहरों में बढ़ते कचरे के ढेर न केवल अस्वच्छता का प्रतीक हैं, बल्कि वे पर्यावरण के लिए गंभीर वैज्ञानिक खतरा उत्पन्न करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, खुले में कचरा जलाने से निकलने वाली विषैली गैसें और सूक्ष्म कण गंभीर बीमारियों को बढ़ावा देते हैं।
प्लास्टिक कचरे के विघटन से उत्पन्न सूक्ष्म कण जल स्रोतों में मिलकर खाद्य शृंखला का हिस्सा बन जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए खतरा बनते हैं। अहम सवाल यह है कि कचरे के ढेर आखिर किन कारणों से निरंतर बढ़ रहे हैं। इसका उत्तर हमारी उपभोक्तावादी संस्कृति में निहित है, जो निरंतर अधिक से अधिक उपभोग करने के लिए प्रेरित करती है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट यह संकेत देती है कि आर्थिक विकास, शहरीकरण और बढ़ते उपभोग के साथ कचरे की मात्रा में भी निरंतर वृद्धि होती है।
वास्तव में, यह समस्या बाहर से अधिक भीतर से जुड़ी हुई है। हम कैसे जीते हैं, क्या खरीदते हैं और कितना त्याग करते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम ऐसे जीवन मूल्यों को अपनाएं, जो संतुलन और संयम पर आधारित हों। समझना होगा कि अत्यधिक उपभोग केवल तात्कालिक सुविधा प्रदान करता है, जबकि दीर्घकाल में यह पर्यावरणीय असंतुलन और संसाधनों के क्षय का कारण बनता है।
जापान जैसे देश यह उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि सादगी, अनुशासन और संतुलित जीवनशैली भी एक समृद्ध और सम्मानित समाज की पहचान हो सकती है। जापानी जीवनशैली का न्यूनतावादी दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण दिशा प्रस्तुत करता है। व्यक्ति को केवल उन्हीं वस्तुओं को पास रखना चाहिए, जो वास्तव में आवश्यक हों। यह दृष्टिकोण अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति को सीमित कर कचरे की समस्या को कम करने में सहायक होगा।

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