ऊर्जा संकट और श्रमिक वर्ग
राजीव त्यागी
भारत जैसे विकासशील देश में जहां आर्थिक प्रगति की गाथाएं अक्सर सुनाई जाती हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिसकी रोज़मर्रा की जि़ंदगी आज भी संघर्षों से भरी हुई है। मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं- यह कथन सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई इससे बहुत दूर नहीं है। जब तक मजदूर को स्थायी रोजगार, उचित वेतन और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलेगी, तब तक उसकी स्थिति में ठोस सुधार संभव नहीं है।
मजदूर के पास चूल्हे जलाने तक के पैसे नहीं- यह न तो पूरी तरह फ़साना है, न ही हर जगह की सच्चाई। यह उस कड़वी हकीकत का प्रतीक है, जिसे हम अक्सर आंकड़ों और विकास के शोर में नजरअंदाज कर देते हैं। ऊर्जा संकट की चुनौती के दौर में सबसे गहरा असर समाज के उस वर्ग पर पड़ रहा है जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर है- मजदूर वर्ग। महंगी बिजली, बढ़ते ईंधन दाम और अनिश्चित रोजगार ने मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी को और कठिन बना दिया है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मजदूर इस संकट से कैसे बाहर निकलें और सरकार व समाज उनकी कैसे मदद कर सकते हैं।
ऊर्जा संकट केवल बिजली की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कोयला आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों, और नीतिगत कमजोरियों से भी जुड़ा है। जब उद्योगों की लागत बढ़ती है, तो सबसे पहले असर मजदूरों की मजदूरी और रोजगार पर पड़ता है। कई छोटे उद्योग बंद होने की कगार पर हैं, जिससे मजदूरों का पलायन तेज हो रहा है।
ऊर्जा संकट के बीच मजदूरों का शहरों से गांव की ओर पलायन ने गहरी चिंता पैदा कर दी है। देश में बढ़ते ऊर्जा संकट ने केवल उद्योगों और अर्थव्यवस्था को ही प्रभावित नहीं किया है, बल्कि इसका सबसे बड़ा असर आम मजदूर वर्ग पर पड़ रहा है। बिजली की कमी, महंगी ऊर्जा और घटते औद्योगिक उत्पादन के कारण शहरों में रोजगार के अवसर लगातार सिकुड़ रहे हैं।
ऐसे हालात में मजदूरों का शहरों से गांवों की ओर पलायन फिर से तेज होता दिख रहा है। ऊर्जा संकट का सीधा असर फैक्ट्रियों और छोटे उद्योगों पर पड़ा है। कई उद्योग या तो बंद हो गए हैं या सीमित क्षमता पर काम कर रहे हैं। इससे दिहाड़ी मजदूरों और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की आय पर गहरा असर पड़ा है। जब शहरों में काम नहीं मिलता, तो मजदूरों के सामने अपने गांव लौटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।


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