आप पार्टी में विघटन का संदेश

- प्रो. नंदलाल
अंततः आप पार्टी में एक बड़ी टूट हो ही गई। वैसे तो टूटने वालों की एक बड़ी फेहरिस्त है पर यह टूट कई संदेश देती है। आशुतोष, प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अलका लांबा, कुमार विश्वास, कपिल मिश्रा कभी का पार्टी छोड़ चुके हैं। सभी ने यही आरोप लगाया कि पार्टी में लोकतंत्र नहीं है। यह सच भी है।पार्टी का जन्म लोकतांत्रिक तरीके से हुआ भी नहीं था, न तो वह कोई पार्टी है।उसे पार्टी कैसे कहा जाय जो एक आंदोलन की उपज है। आंदोलन में आगे आगे चलने वाले कुछ लोग थे, कुछ झंडा लिए, कुछ डंडा लिए तो कोई हांडा लिए। कुमार विश्वास और अरविंद केजरीवाल उस भीड़ को आकर्षित करने में लच्छेदार भाषण दिया करते थे।

कांग्रेस पार्टी का अहंकार सातवें आसमान पर था। जनता बेहद परेशान थी।उस सरकार में भ्रष्टाचार भी बहुत हो रहा था।सरकार को समर्थन दे रहे दल आकंठ धन को लूट रहे थे जनता की कोई सुनने वाला नहीं था।जनता के अंदर मायूसी पर अंदर ही अंदर सरकार के खिलाफ आक्रोश था ऐसे में अन्ना ने लोकपाल की नियुक्ति को लेकर बड़ा आंदोलन छेड़ दिया।उस समय अन्ना की साख थी और जनता किसी ऐसे विद्रोह की राह देख रही थी।पूरे देश में सरकार के खिलाफ माहौल बन गया और उसी का परिणाम 2014 में भाजपा सरकार थी।साथ ही अरविंद केजरीवाल ने अपने आंदोलन साथियों के साथ आप पार्टी बना ली जिसकी पृष्ठभूमि और कुछ नहीं अपितु अन्ना आंदोलन ही था।

       आंदोलन का प्रभाव इतना अधिक था कि अरविंद केजरीवाल को अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ी और दिल्ली में आप पार्टी की भी सरकार बन गई।बिना संगठन बनाए बिना कोई विशेष व्यवस्था किए अन्ना की ईमानदारी और उनके अनुयायियों की आक्रामकता को देख भारत की अचेत जनता ने दिल्ली में अपना विकल्प बना दिया।धीरे धीरे अरविंद केजरीवाल की महत्वाकांक्षा रंग लाई और उनके अंदर के शिलगुण धीरे धीरे बाहर आने लगे।जो पार्टी कोई भी सुविधा नहीं लेने का ऐलान कर चुकी थी अब उसको वे समस्त सुविधाएं चाहिए थी जो आम नेता चाहता है। पार्टी के अंदर की गड़बड़ियों से आप पार्टी धीरे धीरे बिखरने लगी। योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, कपिल मिश्रा, अलका लांबा तमाम नेताओं को अरविंद की चतुराई पसंद नहीं आई और जिस सुविधा की तलाश में लोग आप पार्टी से जुड़े थे वे अरविंद केजरीवाल को छोड़कर अन्य किसी को नहीं मिल पाया।
परिणाम इतना भयंकर हुआ कि अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री रहते जेल जाना पड़ा और उनकी दुर्गति हो गई।अरविंद केजरीवाल चतुर,बुद्धिमान व्यक्ति तो हैं पर वह चतुर और बुद्धिमान नेता नहीं हैं।इसीलिए वह दिन प्रतिदिन मात खाते जा रहे हैं और उनके अधिकांश मंत्री और नेता जेल की हवा खाते रहे।आज वह सत्ता से बेदखल हैं और उनका तुक्का पंजाब में भी चल गया।और वहां भी उन्होंने अपनी सरकार बना ली।मै उन्हें अत्यंत चतुर और बुद्धिमान नेता के तौर पर देखता हूं पर राजनीति में अभी उनको बहुत लंबी यात्रा करनी होगी।उन्हें अपना संगठन बनाना होगा मात्र जनता के ऊब जाने से सहानुभूति का वोट तो मिल सकता है पर लंबी पारी नहीं खेली जा सकती।

आप पार्टी किसी निश्चित उद्देश्यों को लेकर नहीं बनाई गई थी बल्कि अन्ना आंदोलन का राष्ट्रव्यापी समर्थन और यूपीए सरकार की नाकामी से एक नया वर्ग उभरा जिसका नेतृत्व अरविंद केजरीवाल कर रहे थे तो कुछ लोग उससे जुड़कर दिल्ली के चुनाव में कूद पड़े और आप को अच्छी सफलता मिल गई।उस सफलता से अभिभूत होकर अरविंद ने दूर का खेल खेलना शुरू कर दिया और उसको केजरीवाल अपनी पूर्ण कामयाबी मान रहे थे जो वास्तव में नहीं थी।जो पार्टी यूपीए के विरोध में थी और उसी के खिलाफ अन्ना का आंदोलन था,दिल्ली में उसे शीला दीक्षित की सरकार के खिलाफ चुनाव लड़ना था सो आप पार्टी ने कामयाबी पा ली पर जब उस पार्टी के खिलाफ इन्हें चुनाव में जाना पड़ा जो पार्टी अन्ना आंदोलन को पीछे से समर्थन दे रही थी तो कमोवेश अप्रत्यक्ष उद्देश्य तो समान थे पर भाजपा एक परिपक्व पार्टी बन चुकी है तो अरविंद केजरीवाल को मुंह की खानी पड़ी।कांग्रेस ने आप पार्टी से अपने को दूर कर लिया क्योंकि आप पार्टी का प्रादुर्भाव ही कांग्रेस के विरोध पर हुआ था।पर पराभव तो उस पार्टी से मिली जो अन्ना के अप्रत्यक्ष सहयोगी थे।
     मेरा अपना विचार है कि जो पार्टियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया से नहीं बनी हैं उनका मिटना तय है और जिनका अपना कोई निश्चित वोट बैंक नहीं है वह आज के संदर्भ में भहराकर गिर जाएंगी पर जिन क्षेत्रीय पार्टियों का अपना एक निश्चित वोट बैंक है उनका नाम जिंदा रहेगा भले ही उनकी प्रासंगिकता सरकार बनाने और गिराने तक सीमित रहे लेकिन उनकी अपनी भी सरकार नहीं बन सकती।आप देश की उन समस्त पार्टियों की स्थिति देख सकते हैं कि जाति की राजनीति भी बहुत काम आने वाली नहीं है।पार्टियों को लोकतांत्रिक बनना ही होगा।
यही कारण है कि आप पार्टी टूटती जा रही है।या तो किसी व्यक्ति विशेष के पास इतनी संपत्ति हो कि वह भले चुनाव हारता रहे पर पार्टी को अपने दम पर खड़ा रखे।कांग्रेस पार्टी का लंबा और सुधीर्ग़ योगदान है।भाजपा के पास लगभग सत्तर पचहत्तर साल की राजनीतिक परिपक्वता है।सभी नवोदित दलों को इस पर ध्यान देने की जरूरत है।बिना सभी को साथ लिए तानाशाही तरीके से पार्टी को चलाना आसान कार्य नहीं है।आज जितनी पार्टियां ब्राह्मण विरोध पर टिकी हैं उन्हें भी लोकतांत्रिक बनना होगा अन्यथा उनका भी हश्र वही होगा जो आज केजरीवाल देख रहे हैं।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)




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