वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत की दरकार


इलमा अज़ीम 
खाड़ी संकट के बाद सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया को इस दिशा में सोचने को मजबूर किया है। तमाम देश वैचारिक स्तर पर पेट्रोलियम पदार्थों के विकल्पों की खोज में जुटने लगे हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर दुनिया का बढ़ता ध्यान इसी बदलते सोच का प्रतीक है। चीन ने इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने पर पिछले कुछ वर्षों में इतना जोर दिया है कि वहां एक तरह से इलेक्ट्रिक वाहन क्रांति ही आ गई है। 

भारत ने साल 2030 तक कुल वाहनों में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी तीस प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। ईरान संकट के पहले से ही इलेक्ट्रिक वाहनों के चलन को बढ़ावा देने की सरकारी कोशिशों से सालाना पेट्रोलियम आयात में करीब 25 हजार करोड़ की बचत होने लगी है। लेकिन जिस तरह पेट्रोलियम उत्पादक खाड़ी के क्षेत्र में हालात बदल रहे हैं, उससे देश को पेट्रोलियम के विकल्प ढूंढ़ने की दिशा में तेजी लाने और इस सिलसिले में शोध और विकास को भी गति देने की जरूरत बढ़ी है। 

ऐसा किए बिना देश के लिए पेट्रोल और डीजल के आयात के लिए विदेशी मुद्रा के भारी खर्च पर लगाम लगाना आसान होगा। देश के रसोई घरों में पीएनजी यानी पाइप्ड नेचुरल गैस और एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस की खपत बढ़ी है। जाहिर है कि देश का बड़ा गैस खर्च भी आयात पर ही निर्भर है। इसमें दो राय नहीं कि आधुनिक दुनिया की ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत पेट्रोलियम पदार्थ ही हैं, जिसमें डीजल, पेट्रोल और गैस तीनों ही शामिल हैं। 



भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश की ऊर्जा स्रोत के रूप में सबसे ज्यादा खपत डीजल की है, जो कुल पेट्रोलियम खर्च का करीब करीब 38.5 फीसद है। इसके बाद पेट्रोल का नंबर आता है, जिसकी कुल ऊर्जा स्रोत के खपत में करीब 18 प्रतिशत की भागीदारी है, जबकि तीसरे नंबर पर करीब चौदह फीसद हिस्सेदारी के साथ प्राकृतिक गैस है। भारत में बिजली उत्पादन में भी प्राकृतिक गैस का खूब इस्तेमाल होता है। इस पर भी लगाम लगाने के लिए देश को वैकल्पिक उपाय खोजने होंगे। वैसे सौर ऊर्जा और  पवन ऊर्जा की ओर देश ने तेजी से कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अब इन कदमों को और तेजी से विकल्पों की दिशा में बढ़ाना होगा।

No comments:

Post a Comment

Popular Posts