ऐसी ही गलती
बारात आने वाली थी। घर मेहमानों से खचाखच भरा था। मण्डप में कोलाहल था। प्रसन्नता थी। नारायण और सुनीता बहुत खुश थे; उनकी बड़ी बेटी माला की शादी जो हो रही थी। दुःख भी था उन्हें, क्योंकि उनकी माला बेटी उनसे दूर होने वाली थी। आर्मचेयर पर बैठे नारायण ने सुनीता को इशारे से बुलाया, और कहा- 'माला की मम्मी, आज की दुल्हन वाली पूरी रस्में खत्म हो गयी न ?' शुभम, शशांक वगैरह को अपनी-अपनी तैयारी कर लेने बोल देना। बारात वहाँ से निकल गयी है। अनुराग के पापा जी से अभी मेरी बात हुई है। मैं थोड़ा तरूण भैया से मिलकर आ रहा हूँ; थोड़ी सामाजिक मुद्दे वाली बात करनी है।" कुर्सी छोड़कर नारायण अपने सर पर गमछे लपेटते हुए बोला।
 'हाँ..हाँ..अब पूरी रस्में हो गयी है दुल्हन वाली। माला ने भी नहा-वहा लिया है। अपनी सहेलियों के साथ पूजा रूम में है।' सुनीता अपने सर पर आँचल डालती हुई बोली।
नारायण घर से निकल ही रहा था; और सुनीता अपनी ननद को मण्डप में चऊँँक पूरने के लिए कह ही रही थी; तभी उनकी भानजी गीता हाँफती हुई आई, और बोली- 'मामी जी..मामी जी..माला दीदी नहीं दिख रही है। बहुत समय हो गया उसे कहीं गये। हम लोग ढूँढ लिये सब जगह, पता नहीं चला अब तक।' गीता की अटकती हुई आवाज नारायण के कानों पर पड़ी। वह दरवाजे से उल्टे पाँव लौट आया। मण्डप में नारायण और सुनीता कुछ देर तक बतियाते रहे।
              माला का पता करने में सब लग गए। घंटे-दो घंटे तक पास-पड़ोस, गाँव में ही छानबीन होती रही। सबका मोबाइल घनघनाता रहा। सब के मोबाइल स्क्रीन में माला का डायल-नम्बर अंकित था; पर सब व्यर्थ। उसका मोबाइल स्वीच ऑफ था। सब परेशान हो गए। नारायण व सुनीता की हालत खराब हो गयी। काँँटो तो खून नहीं जैसी स्थिति थी उनकी। तभी 'ओम् भूभुर्वः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गोदेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्....' नारायण का मोबाइल रिंगटोन बजा। एक अज्ञात नम्बर रिसीव हुआ- ' हाँ...पापा जी ! मैं माला बोल रही हूँ। प्लीज़ आप कुछ मत बोलना। मुझे माफ करना पापा। मैं यह बात आपको बहुत पहले ही बताने वाली थी, पर मेरी हिम्मत नहीं हुई पापा। पापा, मैं राकेश के बगैर नहीं रह सकती। राकेश के सिवा, मैं किसी और की नहीं हो सकती। मैं और राकेश मंदिर में शादी कर रहे हैं। मुझे ढूँढ़ना मत। प्लीज पापा, मम्मी को सम्भाल लेना। अगर आप लोग ज्यादा कुछ करने की कोशिश करोगे तो मुझे जिंदा नहीं पाओगे। इसलिए मुझे भूल जाओ। मैं आपको डरा नहीं रही हूँ पापा; सच कह रही हूँ। अगर राकेश की नहीं हो पायी, तो मैं मर जाऊँगी। मैं बहुत जिद्दी हूँ पापा, आखिर आपकी ही बेटी हूँ।: मोबाइल फट से बंद हो गया।
मण्डप में सबको पूरी बात अवगत हो गयी। नारायण व सुनीता सर लटकाये बैठे थे। सर उठाते ही दोनों की नजर अपने-अपने माँ-बाप पर पड़ी। बड़े दुखी व चिंतित नारायण और सुनीता को कभी अपनी की हुई एक ऐसी ही गलती याद आ रही थी; जो उनकी बेटी माला ने आज की थी। एक माँ-बाप को अपने ही औलाद के कारण दुःख होना उन्हें आज समझ आ रहा था। आखिर मण्डप में एक बुढ़िया फुसफुसायी- 'हर आदमी को उसकी अपनी संतान ही हँसाती है, तो रुलाती भी है।' एक और हल्का सा स्वर उभरा- 'अरे, बेर के ठूँठ पर बेर का ही पौधा उगता है।'
- टीकेश्वर सिन्हा 'गब्दीवाला'

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