शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट

9 अप्रैल को मेरठ बंद

 सीलिंग के खिलाफ व्यापारियों का फूटा आक्रोश, फोर्स तैनात

मेरठ। शास्त्रीनगर के सेंट्रल मार्केट में मंगलवार को दिनभर भारी फोर्स तैनात रहा। सुप्रीम कोर्ट के 44 अनाधिकृत निर्माण सील करने के आदेश के बाद व्यापारियों ने मेन सेंट्रल मार्केट बाजार बंद रखकर धरना-प्रदर्शन किया। इन अनाधिकृत निर्माण में छह अस्पताल और छह स्कूल व चार बैंक्वेट हॉल भी शामिल हैं।

स्कूल प्रबंधन से टीम की तीखी झड़प हुई। स्कूलों ने हाफ डे कर अभिभावकों को फोन कर बच्चों को ले जाने के लिए बुलाया गया। सुबह सवेरे बच्चों को स्कूल लेकर पहुंचे अभिभावकों में आक्रोश दिखा। संयुक्त व्यापार संघ के दोनों गुटों ने व्यापारियों के बीच बैठक कर 9 अप्रैल को मेरठ बंद का आह्वान किया है।

सोमवार को न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन ने सुनवाई की थी। भूखंड संख्या 661/6 पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो चुकी है। आवास एवं विकास परिषद की ओर से सेंट्रल मार्केट के 859 भूखंड में से 44 ऐसे भवनों की सूची दी गई, जो पूर्णत: व्यावसायिक हैं।

इनमें छह स्कूल, छह अस्पताल और चार बैंक्वेट हॉल समेत शोरूम, दुकानें चल रही हैं। मंगलवार को दिनभर सुप्रीम कोर्ट के आदेश अपलोड होने को लेकर चर्चा होती रही। व्यापारियों ने मेन सेंट्रल मार्केट बाजार बंद कर धरना-प्रदर्शन किया। सरधना से सपा विधायक अतुल प्रधान ने भाजपा पर कटाक्ष करते हुए जमकर निशाना साधा। अस्पतालों से दिनभर मरीज शिफ्ट किए गए और नए मरीजों को भर्ती नहीं किया गया। वहीं दिनभर बाजार में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात रहा।

शाम को सुप्रीम कोर्ट के आदेश अपलोड होते ही व्यापारियों में बेचैनी बढ़ गई। सीलिंग की आशंका के चलते व्यापारी बाजार में जुटे रहे। इस दौरान तमाम दुकानों को खाली भी किया जाता रहा।

याचिकाकर्ता लोकेश खुराना ने बताया कि कोर्ट ने स्कूल में पढ़ रहे विद्यार्थियों का दूसरी जगह दाखिला कराने और अस्पतालों में भर्ती मरीजों को अगली सुनवाई तक दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करने के लिए कहा है। 

आईबीए की पुनर्विचार याचिका भी हो चुकी है खारिज

मेरठ।सेंट्रल मार्केट मामले में आई बी ए सिविल अपील संख्या 14604/2024 और 14605/2024 से जुड़े मामले में 17 दिसंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया गया था। इस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और उत्तर प्रदेश आवास एवं विकास परिषद के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दायर की थी।

 इन याचिकाओं को विगत 17 मार्च 2026 को ही खारिज किया जा चुका है। न्यायालय ने यह फैसला न केवल कानूनी योग्यता के आधार पर, बल्कि याचिका दायर करने में हुई दायर भारी देरी के कारण भी सुनाया। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि याचिका दायर करने में 360 दिनों का अत्यधिक विलंब हुआ है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि पुनरीक्षण याचिकाएं दायर करने में 360 दिनों की अत्यधिक देरी हुई है, जिसके लिए कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। हमारे विचार में, 17.12.2024 के आदेश की समीक्षा का कोई ठोस आधार नहीं बनता है। याचिकाओं को दोहरे आधार पर खारिज किया गया। जिसमें विलंब और दूसरा मेरिट को कारण बताया गया। कोर्ट को पिछले फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नजर नहीं आई।



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