सहजता में ही शांति
इलमा अज़ीम
प्रकृति का एक शाश्वत नियम है- ‘जो वास्तविक है, वही सुंदर है।’ इसलिए स्वयं को दिखावे से मुक्त रखें। अपनी एक कृत्रिम छवि गढ़ने के लिए अपनी ऊर्जा को व्यर्थ न गवांयें । सहज जीवन वह भूमि है जहां संवेदनाओं की हरियाली सदैव लहलहाती रहती है। वास्तव में, सहजता ही वह उर्वर शक्ति है जो हमारे व्यक्तित्व को ‘बंजर’ होने से बचाती है। यह समय की विसंगति ही कही जाएगी कि आर्थिक तरक्की और समृद्धि के बावजूद हमारे व्यवहार में कृत्रिमता का गहरा दखल हो गया है।
मसलन हम आध्यात्मिक व धार्मिक होने का प्रदर्शन तो करते हैं लेकिन सही मायनों में हमारे कार्य व्यवहार में वो नजर नहीं आता है। आखिर व्यक्ति को अपने सामाजिक दायरे में ये गिरगिटी रंग क्यों बदलने पड़ते हैं? आखिर व्यक्ति क्यों स्वाभाविक जीवन नहीं जी पाता? दरअसल, सहजता का अर्थ है, मनुष्य का मूल व्यवहार। वह जो मनुष्य मूल प्रकृति है, जो हमारी कृत्रिमता, प्रदर्शन की इच्छा या ‘लोग क्या कहेंगे’ के भय से मुक्त है। सहज व्यक्तित्व में कोई जटिलता नहीं होती और अंदर कोई दोहरा व्यक्तित्व भी नहीं पलता।
सहज व्यक्ति अपनी कमियों और खूबियों के साथ को स्वीकार करता है। हां, सहजता का अर्थ प्रमाद, अनुशासनहीनता या अनियंत्रित होना बिल्कुल नहीं है। ग्रंथों के अनुसार अपने मूल स्वभाव को छोड़कर किसी दूसरे के छद्म व्यवहार का अनुसरण सर्वथा त्याज्य है। यहां ‘स्वधर्म’ का अभिप्राय किसी कर्मकांड से नहीं, अपितु हमारी उस ‘मौलिक प्रकृति’ से है, जिसके साथ हमारा अस्तित्व स्पंदित होता है।
यदि मनुष्य अपनी मौलिकता के व्यवहार में जीवन जीता है तो वह स्वस्थ जीवन भी जी सकता है। सहजता की ओर लौटने में ‘स्वयं की स्वीकार्यता’ ही सबसे महत्वपूर्ण सोपान है। हमें स्वयं को उसी रूप में स्वीकार करना चाहिए जैसे हम वास्तव में हैं। जब हम अपनी वास्तविकता को स्वीकार कर लेते हैं तो हम दूसरों के सामने बेझिझक अपनी मौलिकता और सहजता के साथ खड़े नजर आ सकते हैं। अर्थात् जैसा हमारा चित्त हो, वैसी ही हमारी वाणी हो और जैसी हमारी वाणी हो, वैसा ही हमारा आचरण हो।





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