कान्हा का उपहार

​कान्हा तेरे द्वार पर, सिर झुका जब पहली बार था,

किलकारी मेरे आँगन में भी गूँजेगी, यह एहसास था।

​माँगा थोड़ा, बढ़कर अनोखा तुमने दिया मुझे उपहार है,

खुशियाँ जीवन की अनोखी देकर, किया मुझ पर उपकार है।

​कभी न हारा मन, जिसके होने से पूरा संसार है,

क्या कहूँ, तुमने ही तो दिया मुझे अनोखा उपहार है।

​मान बढ़ाए, नाम कमाए, जीवन में आगे बढ़ता जाए,

अरावली की भूमि में जन्मा, मेरा यह संसार है।

​मालव भूमि सा प्रेमी, अरावली सा दृढ़ संकल्पित,

इस माँ का यह लाल है;

क्या कहूँ मैं कान्हा, दिया तुमने अनोखा उपहार है।

​मन भर जीवे, मन भर फले-फूले, तेरा यह उपहार है,

क्या कहूँ मैं कान्हा, दिया तुमने अनोखा उपहार है।


मनीषा पंवार "जयमनी" इंदौर

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