युद्ध संकट में फंसा वैश्विक तेल बाजार


- अनुज आचार्य
पश्चिम एशिया लंबे समय से विश्व की ऊर्जा राजनीति का केंद्र रहा है और वहां होने वाला कोई भी सैन्य या राजनीतिक टकराव सीधे वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित करता है। इजरायल-अमेरिका और ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी इसी संवेदनशीलता का परिणाम है।

 पिछले कुछ दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है (एक बैरल में लगभग 159 लीटर कच्चा तेल होता है।) कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) से मुख्यत: कई तरह के पदार्थ बनाए जाते हैं, जिनमें गैसोलीन, पेट्रोल, डीजल, केरोसीन, लुब्रिकेंट्स (इसकी अलग अलग कई श्रेणियां होती हैं), एलपीजी गैस, पैराफिन मोम, बिटुमिन, पेट्रो कॉक, पॉली एथिलीन, टेफलोन, पॉली विनायल क्लोराइड, एसफॉल्ट, प्रोपेन, सल्फर। इन सबके अतिरिक्त लगभग 120 से ज्यादा तरह के उपोत्पाद कच्चे तेल या क्रूड ऑयल से प्राप्त होते हैं। जैसे ही भारत में गैस किल्लत की खबरें आना शुरू हुईं भारत में केवल 4 दिनों में लगभग 5 लाख इंडक्शन कुकटॉप्स बेचे गए, इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत जैसे तेजी से विकसित हो रहे देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में किसी भी प्रकार की वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई दर और राजकोषीय संतुलन पर पड़ता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आकलन के अनुसार कच्चे तेल की कीमत में प्रत्येक 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से भारत के आयात बिल में 13 से 14 अरब डॉलर तक की अतिरिक्त वृद्धि हो सकती है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है, बल्कि घरेलू बाजार में भी महंगाई का दबाव बढ़ जाता है। ऊर्जा की कीमतों में यह वृद्धि परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत को बढ़ा देती है, जिससे समग्र अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है। इसलिए तेल की कीमतों में तेजी को केवल ऊर्जा संकट के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक चुनौती के रूप में देखा जाता है। यदि हम भारत में तेल गैस के स्टॉक के गणित का जायजा लें तो भारत में 25 दिन के लिए क्रूड ऑयल, 25 दिन तक के लिए ही पेट्रोल डीजल का स्टॉक बचा है और एलपीजी का 25 से 30 दिन और एलएनजी का 10 दिन का स्टॉक बचा है। वहीं चीन और जापान जैसे देशों के पास 200 से ज्यादा दिनों तक का पेट्रोल-डीजल का स्टॉक रखने का इंतजाम है।
भारत में रोजाना क्रूड ऑयल की लगभग 5.5 मिलियन की खपत होती है, जबकि इतना ही 4.8 से 5.2 मिलियन बैरल क्रूड का भारत रोजाना इंपोर्ट करता है, जोकि सालाना करीब 240 से 250 मिलियन टन बैठता है। इस समय भारत 90 फीसदी ऑयल इंपोर्ट और 50 फीसदी गैस इंपोर्ट पर निर्भर है। भारत अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तक का क्रूड इंपोर्ट करता है। इस साल भारत में करीब 96399 हजार टन डीजल, 44877 टन पेट्रोल और 34692 टन एलपीजी की खपत होने का अनुमान है। जनवरी 2026 में भारत में 21.05 मिलियन टन तेल गेस की खपत हुई थी।
आंकड़े बताते हैं कि 2026-27 में 250.8 मिलियन टन तेल गैस की खपत होने का अनुमान है। 

पिछले 15 वर्षों में भारत का तेल गैस का इंपोर्ट लगभग तीन गुना बढ़ गया है। हालांकि भारत ने पिछले वर्षों में अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। देश ने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण किया है, जहां आपातकालीन परिस्थितियों में उपयोग के लिए कच्चा तेल संग्रहीत किया जाता है। हाल के दिनों में देश के कई हिस्सों में रसोई गैस की उपलब्धता को लेकर चिंता दिखाई दी है। इसका एक प्रमुख कारण यह है कि भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है और इन टैंकरों को भारत तक पहुंचने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरना पड़ता है। यदि इस समुद्री मार्ग पर किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न होती है तो आपूर्ति श्रृंखला तुरंत प्रभावित हो जाती है। हिमाचल प्रदेश में भी प्रशासन ने स्थिति की समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया है कि घरेलू रसोई गैस, पेट्रोल और डीजल का पर्याप्त भंडार उपलब्ध है। प्रदेश में लगभग तीन लाख घरेलू गैस सिलेंडर और लगभग 15 हजार व्यावसायिक सिलेंडरों का स्टॉक मौजूद है।

प्रदेश सरकार और प्रशासनिक तंत्र ने यह भी स्पष्ट किया है कि आवश्यक सेवाओं जैसे अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और सार्वजनिक सेवाओं को प्राथमिकता के आधार पर गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है। साथ ही कालाबाजारी या अवैध भंडारण करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं। दीर्घकालिक दृष्टिकोण से यह आवश्यक है कि देश ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों, जैसे सौर, पवन और हरित हाइड्रोजन की ओर तेजी से आगे बढ़े। साथ ही ऊर्जा भंडारण और आपूर्ति अवसंरचना को भी मजबूत किया जाए, ताकि अंतरराष्ट्रीय संकटों का प्रभाव घरेलू अर्थव्यवस्था पर कम से कम पड़े। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था अभी भी भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। 

ऐसे में भारत के लिए ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता, रणनीतिक भंडारण का विस्तार और नवीकरणीय ऊर्जा के विकास जैसे उपाय ही भविष्य की स्थिरता की कुंजी साबित होंगे। अंतत: यह संकट केवल तेल की कीमतों का सवाल नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक राजनीतिक संतुलन का भी प्रश्न है। यदि भारत इन चुनौतियों से सबक लेकर ऊर्जा व्यवस्था को अधिक संतुलित और टिकाऊ बनाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो भविष्य में ऐसे संकटों के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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