शून्य की ओर सुशासन
- हरिओम हंसराज
बिहार की राजनीति के क्षितिज पर नीतीश कुमार का उदय एक ऐसे नायक के रूप में हुआ था, जिसने जंगलराज के अंधकार से राज्य को बाहर निकालने का संकल्प लिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने अपने शुरुआती कालखंड में सड़कों का जाल बिछाकर, कानून का इकबाल बुलंद कर और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाकर खुद को एक महान विकास पुरुष के रूप में स्थापित किया। लेकिन राजनीति का एक क्रूर और शाश्वत सत्य यह भी है कि किसी भी नेता की वास्तविक महानता केवल उसके द्वारा किए गए विकास कार्यों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा तैयार की गई विरासत और उत्तराधिकार से मापी जाती है। आज जब नीतीश कुमार एक बार फिर अपने राजनीतिक फैसलों के कारण चर्चा के केंद्र में हैं, तो यह प्रश्न और भी प्रखर हो गया है कि क्या वे अपनी महानता को सत्ता की वेदी पर बलि चढ़ा रहे हैं?
नेतृत्व का सबसे अनिवार्य गुण होता है, अपने सानिध्य में एक ऐसी पौध तैयार करना, जो आपकी अनुपस्थिति में भी व्यवस्था को संभाले रखे। इतिहास गवाह है कि बड़े से बड़ा शासक, कप्तान या नायक भी यदि अपने संरक्षण में एक योग्य उत्तराधिकारी खड़ा नहीं कर पाता, तो समय की निष्पक्ष अदालत उसे केवल एक स्वार्थी अध्याय के रूप में दर्ज करती है। नीतीश कुमार के संदर्भ में त्रासदी यही रही है कि करीब दो दशकों तक बिहार की निर्विवाद कमान संभालने के बाद भी, आज उनकी पार्टी जेडीयू के भीतर नेतृत्व का एक भयावह शून्य व्याप्त है। मुख्यमंत्री का पद छोड़ राज्यसभा जाने का उनका फैसला यह दर्शाता है कि उनकी राजनीति अब केवल वर्तमान की जोड़-तोड़ और तात्कालिक अस्तित्व को बचाने तक सिमट गई है, जबकि एक सच्चा स्टेट्समैन अपनी विरासत के कल की नींव रखता है।
नीतीश कुमार के राजनीतिक सफर का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो एक पैटर्न साफ नजर आता है,अपरिहार्यता का मोह। उन्होंने स्वयं को बिहार की राजनीति का ऐसा केंद्र बिंदु बना लिया है जिसके बिना सत्ता का कोई भी समीकरण पूरा नहीं होता। लेकिन इस अपरिहार्यता की कीमत पार्टी के भीतर लोकतंत्र और दूसरी पंक्ति के नेतृत्व ने चुकाई है। उनके सानिध्य में समय-समय पर कई कद्दावर नेता उभरे, जिनमें भविष्य का मुख्यमंत्री बनने की स्पष्ट क्षमता थी। चाहे वे रणनीतिकार हों या जमीनी राजनेता, जब भी किसी ने नीतीश कुमार के कद के बराबर खड़े होने या स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश की, उसे या तो मार्ग से हटा दिया गया या वह स्वयं राह बदलने पर मजबूर हो गया। जब एक बरगद इतना विशाल हो जाए कि वह अपने नीचे किसी भी छोटे पौधे को पनपने न दे, तो उस बरगद के गिरने के बाद केवल उजाड़ शेष बचता है।
आज नीतीश कुमार ने जो राजनैतिक निर्णय लिया है, वह उनके स्वार्थ और असुरक्षा के द्वंद्व को साफ उजागर करता है। एक महान शासक वह होता है जो अपनी सत्ता के सूर्यास्त से पहले एक ऐसे उत्तराधिकारी को गढ़ दे, जो उसके द्वारा शुरू किए गए विकास के रथ को निर्बाध गति प्रदान कर सके। परंतु नीतीश कुमार के मामले में आज भी जनता के मन में यह सवाल कौंधता है कि नीतीश के बाद कौन? इस सवाल का अनुत्तरित रहना ही उनकी सबसे बड़ी असफलता है। यदि आज वे सक्रिय राजनीति से ओझल होते हैं, तो उनकी पार्टी का ताश के पत्तों की तरह बिखरना लगभग तय माना जाता है। यह स्थिति दर्शाती है कि उन्होंने अपनी कुर्सी की सुरक्षा के लिए संगठन के भविष्य को दांव पर लगा दिया है।
इतिहास ऐसे नायकों के प्रति बड़ा निर्मम होता है जो शिखर पर तो पहुँच जाते हैं, लेकिन पीछे आने वालों के लिए सीढ़ी का निर्माण नहीं करते। नीतीश कुमार ने बिहार को विकास की नई परिभाषाएं दीं, बिजली-सड़क की समस्या सुलझाई और सामाजिक सुधारों की बात की, लेकिन उन्होंने एक संस्थागत नेतृत्व का निर्माण नहीं किया। आज के उनके फैसले यह संकेत देते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं अब सिद्धांतों से हटकर केवल सत्ता के गणित तक सीमित रह गई हैं। एक सच्चा नेता वह है जो अपने विकल्प तैयार करे, न कि हर उभरते विकल्प को समाप्त कर दे। बिना उत्तराधिकार के छोड़ी गई विरासत अक्सर इतिहास के पन्नों पर धूल चाटती नजर आती है, और यही नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना साबित हो सकती है।
विरासत का अर्थ केवल पद और प्रतिष्ठा का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि उस कार्य संस्कृति और विजन को आगे बढ़ाना है जिसे आपने वर्षों की तपस्या से खड़ा किया है। यदि आज बिहार पुनः उसी राजनीतिक अस्थिरता या अनिश्चितता की ओर बढ़ता है जिससे नीतीश कुमार ने इसे बड़ी मशक्कत के बाद निकाला था, तो इसका दोष भी उनके कमजोर उत्तराधिकार नियोजन के मत्थे ही मढ़ा जाएगा। एक प्रशासक के रूप में उनकी उपलब्धियां भले ही निर्विवाद हों, लेकिन एक मार्गदर्शक के रूप में उनकी उदासीनता भविष्य में उनकी महानता पर प्रश्नचिह्न लगाएगी। जब कोई नेता अपने सानिध्य में किसी दूसरे को पनपने नहीं देता, तो वह परोक्ष रूप से यह स्वीकार कर रहा होता है कि उसे अपनी विरासत के भविष्य से ज्यादा अपनी वर्तमान सत्ता की सुरक्षा से मोह है।
वर्तमान परिदृश्य में नीतीश कुमार का राजनीतिक जीवन उपलब्धियों और अंतर्विरोधों का एक ऐसा जटिल मिश्रण बन चुका है, जहाँ उनकी छवि एक कुशल मैनेजर की तो है, पर एक मेंटर की नहीं। उन्होंने बिहार को पहचान दिलाई, पर नेतृत्व की नर्सरी को सुखा दिया। आज के फैसले के बाद नीतीश कुमार इतिहास की उस दहलीज पर खड़े हैं जहाँ फैसला होना बाकी है,क्या वे एक महान निर्माता के रूप में याद किए जाएंगे, या एक ऐसे स्वार्थी राजनेता के रूप में जिसने अपनी चमक बचाने के लिए भविष्य की रोशनी ही बुझा दी? सत्ता की चकाचौंध में शायद उन्हें यह महसूस न हो, लेकिन इतिहास की कलम उनके इस उत्तराधिकार विहीन साम्राज्य पर बहुत कड़वे शब्द लिखने की तैयारी कर रही है।
नीतीश कुमार को यह समझना होगा कि बिना सेकंड लाइन लीडरशिप के कोई भी आंदोलन या दल अमर नहीं होता। यदि वे इस आत्मघाती दृष्टिकोण को नहीं बदलते, तो सत्ता की चकाचौंध ढलते ही इतिहास उन्हें स्वार्थी मानकर विस्मृत करने में देर नहीं लगाएगा। महानता का वास्तविक मुकुट उसी के सिर पर सजता है जो खुद के ओझल होने के बाद भी अपने तैयार किए गए योग्य उत्तराधिकारियों के माध्यम से व्यवस्था को जीवित रखता है। अन्यथा, उनकी तमाम उपलब्धियां उनके साथ ही इतिहास के धुंधलके में खो जाएंगी, और वे केवल एक ऐसे शासक के रूप में दर्ज होंगे जिसने अपने वर्तमान के लिए बिहार के भविष्य को लावारिस छोड़ दिया।





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