प्रदूषण के प्रति गंभीरता जरूरी
इलमा अज़ीम
भारत में प्रदूषण का संकट एक यथार्थ है। इसी के साथ एक हकीकत यह भी है कि देश के नीति-नियंता प्रदूषण संकट के समाधान को लेकर गंभीर नजर नहीं आते। जब-जब प्रदूषण संकट गहराता है तो आग लगने पर कुआं खोदने की कवायद की जाती है। कोर्ट की फटकार व नियामक एजेंसियों की सख्ती के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आता है।
लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला ही होता है। यह एक हकीकत है कि हमारे देश में प्रदूषण संकट बड़ा है, जिसे देश के नीति-नियंता गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। जिसके चलते करोड़ों भारतीयों को अपनी जमा-पूंजी अपने व परिवार के उपचार में खर्च करनी पड़ती है। निस्संदेह, प्रदूषण के खिलाफ युद्ध स्तर पर कार्रवाई करने की जरूरत है। साथ ही प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े कानूनों को सरल बनाने की भी जरूरत है ताकि उन पर अमल आसानी से हो सके।
इसके अलावा लोगों को भी जागरूक करने की जरूरत है कि देश की आबोहवा सुधारने के लिये उन्हें भी कुछ त्याग करने होंगे। उन्हें अपनी विलासिता की जीवन शैली में बदलाव लाकर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुधारना होगा। निश्चित रूप से प्रदूषण को आर्थिक चुनौती के रूप में भी देखने की जरूरत है। खासकर जब भारत खुद को वैश्विक आर्थिक और विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिये प्रयासरत है।
हमारा मकसद हो कि हमारे शहर स्वच्छ रहें और नागरिकों के लिये जीवन परिस्थितियां स्वास्थ्य के अनुकूल हों। बहरहाल आज के समय में प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन चुका है। “प्रदूषण का स्वास्थ्य पर प्रभाव” सभी के लिए चिंता का विषय है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण और मृदा प्रदूषण जैसे विभिन्न प्रदूषण के प्रकार हमारे शरीर और दिमाग़ पर बुरा असर डालते हैं। अगर हमने प्रदूषण से होने वाले नुक़सान और उनके बचाव के उपाय नहीं जाने, तो स्वास्थ्य संबंधी कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं।





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