हो कारगर तैयारी
राजीव त्यागी
मौसम के मिजाज में आ रहे असामान्य बदलाव का हमारे जीवन और आजीविका पर गहरा प्रभाव आने वाले दिनों में नजर आएगा, जिसको लेकर देशव्यापी चर्चा जारी है। खासकर यूपी के कृषि क्षेत्र में इसके नकारात्मक आर्थिक परिणामों को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। इससे बचने के लिए अनुकूलन उपायों में जलवायु अनुरूप बागवानी पद्धतियों को अपनाने के साथ ही आवश्यकता होगी कि हम सूखा-सहिष्णु फसलों को अपनाएं। कम जल के बेहतर उपयोग के प्रयास हों।
अब सिर्फ वैकल्पिक फसलों के भरोसे ही नहीं रहा जा सकता, कई मोर्चों पर पहल करने की जरूरत होगी। कुल मिलाकर एक स्पष्ट रणनीति को अपनाकर हम बढ़ती गर्मी के दुष्प्रभावों से बच सकते हैं। इसमें दो राय नहीं है कि मार्च के पहले सप्ताह में उच्च तापमान का महसूस होना, आने वाले संकट का स्पष्ट संकेत है। अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में ग्रीष्म ऋतु में आने वाले लू के दिनों की संख्या 1980 के बाद से दुगनी से भी अधिक हो गई है। हमारे देश में तीव्र शहरीकरण, सघन निर्माण और हरित क्षेत्रों के लगातार जारी क्षरण के चलते भी तापमान में वृद्धि हुई है।
ऐसे में बढ़ते तापमान से उत्पन्न जल व ऊर्जा संकट से निपटने के लिए तत्काल कारगर योजनाओं की जरूरत है। इसके साथ ही शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु में तेजी से होने वाले परिवर्तन के इस नये असामान्य परिदृश्य के लिए नागरिकों की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के लिए भी एक नया चार्टर बनाने की आवश्यकता होगी। सरकारों की तैयारियों को लेकर भी स्पष्ट रीति-नीति का निर्धारण जरूरी है।
निस्संदेह, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के निस्तारण के लिए रणनीतियों को लेकर सहभागी दृष्टिकोण प्रभावकारी हो सकता है। आने वाले समय में मौसम की चरम स्थितियां घातक साबित हो सकती हैं, जिनका मुकाबला मौजूदा अपर्याप्त प्रशासनिक योजनाओं के जरिये संभव न होगा। इसके लिए कारगर रणनीतियां बनाने की जरूरत होगी।
लेखक वेक्टेश्वरा विवि के प्रति कुलपति है एवं स्वतंत्र पत्रकार है





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