महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी की चुनौतियां
- हरिओम हंसराज
भारतीय लोकतंत्र की यात्रा जितनी विस्तृत है, उतनी ही जटिल भी। आजादी के बाद से लेकर 2024 के आम चुनावों तक महिलाओं की मतदान भागीदारी में असाधारण वृद्धि देखी गई है। परंतु इस लंबे सफर में एक प्रश्न बार-बार उभरता है! क्या महिलाओं की उपस्थिति केवल वोटिंग प्रतिशत तक सीमित है, या वे राजनीतिक निर्णयों के महत्वपूर्ण केंद्रों तक भी पहुँच पाई है? यदि आँकड़ों को देखें, तो स्पष्ट होता है कि पिछले कई दशकों में उनकी भागीदारी बढ़ी अवश्य है, पर प्रभाव अब भी उस अनुरूप नहीं बढ़ पाया, जितनी अपेक्षा समाज और लोकतंत्र उनसे करता है।
लोकसभा चुनावों के पिछले चार चरणों की कहानी इस अंतर को स्पष्ट कर देती है। 2009 के लोकसभा चुनाव में कुल सांसदों में मात्र 58 महिलाएँ थीं, जो लगभग 10.7 प्रतिशत प्रतिनिधित्व था। 2014 में यह संख्या 62 पर पहुँची, लेकिन कुल भागीदारी यानी 11.2 प्रतिशत अब भी बेहद सीमित थी। 2019 में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 78 तक गया, जो अब तक का सर्वोच्च स्तर था और इसने 14.3 प्रतिशत का आँकड़ा पार किया। परंतु 2024 में उम्मीदों से उलट यह संख्या घटकर 74 रह गई यानी 13.6 प्रतिशत। दिलचस्प यह भी है कि 2024 में कुल उम्मीदवारों में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 9.6 प्रतिशत थी। यह घटना इस धारणा को पुष्ट करती है कि महिलाओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ने के बावजूद नेतृत्व के अवसरों में कमी आ रही है।
सवाल यह भी है कि मतदान में महिलाओं की बढ़ती शक्ति का राजनीतिक पार्टियों के व्यवहार पर कितना प्रभाव पड़ा। 2024 के चुनावों में कई राज्यों में महिलाओं ने पुरुषों से अधिक मतदान किया। बिहार, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में महिलाओं की मतदान भागीदारी कई बार निर्णायक साबित हुई। पर टिकट वितरण के आँकड़े इस बढ़ते प्रभाव को स्वीकारते हुए नहीं दिखते। अधिकांश दलों में टिकट पाने वाली महिलाओं का अनुपात 8 से 12 प्रतिशत के बीच ही रहता है। यानी राजनीतिक दल उनके वोट तो चाहते हैं, पर नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपने को तैयार नहीं दिखते।
राज्य विधानसभाओं में स्थिति थोड़ी और सीमित दिखाई देती है। 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में कुल 243 सीटों में से केवल 28 महिलाएँ चुनी गईं यानी लगभग 11.5 प्रतिशत। 2020 में यह संख्या 26 पर 2015 में यह संख्या 28 थी। उत्तर प्रदेश में 2022 के चुनावों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 34 रहा,लगभग 8 प्रतिशत के आसपास। मध्यप्रदेश में 2023 में यह संख्या कुल सदस्यों का लगभग 9 प्रतिशत रही। इन आँकड़ों को देखकर स्पष्ट होता है कि राज्य-स्तरीय राजनीति में महिलाओं की उपस्थिति स्थिर भी नहीं है और बढ़ भी नहीं रही। कई राज्यों में तो पिछले दो चुनावों के बीच उनकी संख्या घटी है।
यदि हम पंचायतों और स्थानीय निकायों की ओर देखें तो तस्वीर कुछ हद तक सकारात्मक नजर आती है। 73वें और 74वें संविधान संशोधन के बाद से पंचायतों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण ने grassroots शासन में असाधारण बदलाव लाया। आज देश भर में लगभग 46 प्रतिशत पंचायत प्रतिनिधि महिलाएँ हैं। बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू है, जिसके चलते लाखों महिलाएँ ग्राम-स्तर के प्रशासन का नेतृत्व कर रही हैं। केवल बिहार में ही लगभग 1.25 लाख महिला प्रतिनिधि पंचायतों में सक्रिय हैं। यह संख्या बताती है कि अवसर मिलने पर महिलाएँ स्थानीय प्रशासन में कितना व्यापक योगदान दे सकती हैं।
परंतु यह सकारात्मकता भी चुनौतियों से मुक्त नहीं है। पंचायतों में अब भी प्रॉक्सी नेतृत्व या सिर्फ नाम की मुखिया-सरपंच की समस्या गंभीर है। कई जगह निर्वाचित महिला प्रतिनिधि निर्णयों में स्वतंत्र नहीं, बल्कि पारिवारिक पुरुष सदस्यों पर निर्भर रहती हैं। यह समस्या बताती है कि संख्या बढ़ने का अर्थ सशक्तिकरण नहीं, जब तक महिलाएँ शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्वीकृति के साथ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में अपना स्वतंत्र स्थान नहीं बना लेतीं।
देश में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी का एक बड़ा कारण राजनीतिक दलों की संरचना और उनका दृष्टिकोण है। आज लगभग हर दल अपने घोषणा-पत्रों में महिला-सशक्तिकरण की बातें करता है, पर टिकट वितरण में वही पुराने मानक लागू होते हैं, सुरक्षित सीटें, संसाधन-संपन्न स्थान, संगठनात्मक शक्ति, यह सभी स्थान अभी भी पुरुष नेताओं के नियंत्रण में हैं। महिलाएँ अक्सर उन सीटों पर उतारी जाती हैं जहाँ मुकाबला कठिन होता है या जहाँ पार्टी को जीत की संभावना कम होती है। इसके बावजूद कई महिलाएँ सीमित संसाधनों के साथ भी बेहतर प्रदर्शन करती हैं।
संसद की कार्यवाही में भी महिलाओं की सक्रियता लगातार उल्लेखनीय रही है। महिला सांसदों ने कई बार अधिक उपस्थिति, अधिक प्रश्न पूछने और अधिक निजी विधेयक लाने में पुरुष सांसदों से बेहतर प्रदर्शन किया है। परंतु उनकी संख्या कम होने के कारण प्रमुख समितियों, महत्वपूर्ण मंत्रालयों, और बड़े निर्णयों वाले मंचों पर उनकी उपस्थिति सीमित रह जाती है। इसके बावजूद देश ने कई महिला नेताओं को मजबूत निर्णयकर्ता के रूप में उभरते देखा है,इंदिरा गांधी, सुषमा स्वराज, प्रतिभा पाटिल, मेधा पाटकर, जयललिता,मायावती और ममता बनर्जी इसके उदाहरण हैं। पर इन नामों की संख्या देश की आबादी के अनुपात में बहुत कम है।
महिला आरक्षण विधेयक 2023 का पारित होना भारतीय राजनीति के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है। लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद महिलाओं की संख्या बढ़ेगी, पर वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या इससे उनकी राजनीतिक शक्ति भी बढ़ेगी? या केवल संख्या बढ़ेगी? आरक्षण लागू होने में जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं, जिन्हें पूरा होने में समय लगेगा। पर यह निश्चित है कि आने वाले चुनावों में महिलाएँ राजनीति के केंद्र में अधिक मजबूती से उभरेंगी।
इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय समाज की मानसिकता भी तेजी से बदल रही है। आज की महिला शिक्षित है, तकनीकी रूप से सक्षम है, और सामाजिक मुद्दों पर स्पष्ट दृष्टिकोण रखती है। ग्रामीण भारत में भी महिलाओं की राजनीतिक जागरूकता बढ़ी है। आत्म-सहायता समूहों, डिजिटल साक्षरता, पंचायत स्तर के प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सरकारी योजनाओं ने महिलाओं को निर्णय-निर्माण से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है। यह परिवर्तन आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा बदल सकता है।
इन सभी तथ्यों के बीच एक निष्कर्ष स्पष्ट है,भारत में महिलाएँ लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी हैं, पर अभी भी सबसे कम प्रतिनिधित्व वाली वर्ग भी वही हैं। लोकतंत्र की मूल भावना तभी सार्थक होगी जब संसद से लेकर पंचायत तक निर्णय लेने वाली कुर्सियों पर उनकी हिस्सेदारी समान हो। केवल वोट देने में आगे होना पर्याप्त नहीं नीतियाँ बनाने, योजनाओं को दिशा देने और शासन का संचालन करने में भी उनका नेतृत्व आवश्यक है।
देश की राजनीतिक व्यवस्था के सामने आज यही सबसे महत्वपूर्ण चुनौती है,महिलाओं को केवल मतदाता के रूप में नहीं, बल्कि नेता और नीति-निर्माता के रूप में स्वीकार करना। यह न केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न है, बल्कि लोकतांत्रिक गुणवत्ता का भी। महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व जितना मजबूत होगा, देश का लोकतंत्र उतना ही अधिक प्रतिनिधि, स्थिर और समावेशी बनेगा।





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