कवलजीत सिंह
दिल्ली में प्रदूषण को लेकर भारी चिंता है, लेकिन यह सिर्फ दिल्ली का ही संकट नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हरियाणा, उ.प्र. व राजस्थान के कई शहर भी प्रदूषणग्रस्त हैं। इसके अलावा लखनऊ, वाराणसी, जयपुर, पटना, मुजफ्फरपुर, कानपुर व देश के अन्य शहरों में भी प्रदूषण संकट आम लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रहा है।
हालांकि, इन शहरों में संकट दिल्ली जैसा नहीं है, लेकिन पूरे देश के लिए दीर्घकालीन योजना बनाने की जरूरत है। दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक का 450 के आसपास बना रहना, निश्चय ही खतरे की घंटी है। दिल्ली सरकार द्वारा उत्सर्जन मानकों का उल्लंघन करने वाले वाहनों के शहर में प्रवेश पर रोक, दफ्तरों में वर्क फ्रॉम-होम, स्कूलों में ऑनलाइन पढ़ाई, तोड़फोड़ व निर्माण पर रोक के बावजूद आशातीत परिणाम सामने नहीं आए हैं। चीन की सफलता से सीखा जा सकता है।
चीन ने पिछले दो दशकों में आक्रामक ढंग से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाया। वाहन उत्सर्जन पर नियंत्रण किया। लाइसेंस प्लेट लॉटरी व ऑड-ईवन से सड़कों पर वाहनों को कम किया। उसने बड़े मेट्रो-बस नेटवर्क को बढ़ाकर सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाया। करीब तीन हजार के करीब भारी उद्योगों को बीजिंग व आसपास के शहरों से हटाया गया। एक बड़ी स्टील कंपनी को हटाने से घातक कणों में बीस फीसदी की कमी आई। सबसे अधिक जोर कोयले पर आधारित बिजली संयंत्रों व उद्योगों पर रोक लगाने में लगा।
इसके अलावा, निर्माण स्थलों पर धूल-रोधी जाली लगाने, पानी के छिड़काव-सफाई, किसानों को पराली भत्ता देने व प्रदूषण के पीक समय में निर्माण पर रोक जैसे कदम उठाए। वहां पौधारोपण को बढ़ावा दिया गया। कोयला आधारित संयंत्रों को बंद करने, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करने तथा औद्योगिक संस्थानों को राजधानी की सीमा से बाहर किया जाना चाहिए। चिंता की बात यह भी है कि दिल्ली की तीन सौ किमी की परिधि में ग्यारह कोयला आधारित पॉवर प्लांट्स हैं, जिन्हें सर्वाधिक प्रदूषण का स्रोत माना जाता है। बहरहाल, दीर्घकालिक नीति बनाने व फैसलों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है।





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