युवाओं में बढ़ता तनाव व अवसाद
- प्रो. नंदलाल
देश की आबो हवा बदल रही है। युवाओं को अपनी संस्कृति और सामाजिक मानकों में कोई विशेष रुचि नहीं है। बड़े बुजुर्ग अथवा घर परिवार के लोगों की अप्रत्यक्ष अवहेलना भी उनके लिए अब एक सामान्य प्रक्रिया बन गई है। उनके सामनेप्रत्यक्ष अवलोकन के लिए या आदर्श के रूप में माता पिता बड़े भाई बहन इत्यादि न होकर अब फिल्मी चरित्र और सोशल मीडिया के मॉडल हो गए हैं। सोशल मीडिया ने समाज में ऐसा भ्रम फैला रखा है जिससे हर एक व्यक्ति मुंगेरी लाल के सपने ही देख रहा है। अचानक इन्हें अपने अंदर अनेक हुनर नजर आने लगे हैं।
युवा अनेक क्षेत्रों में उद्यत हैं। कुछ अध्ययनशील हैं, कुछ रोजगार में लगे हैं, तो कुछ बेरोजगारी में अपना समय काट रहे हैं। कुछ सरकारी जॉब में आ गए हैं तो कुछ निजी क्षेत्रों में कार्यरत हैं।आज के युवाओं में लक्ष्यभ्रम इतना अधिक है कि वे द्वंद्व में उलझे रहते हैं।मानव को जीवन निर्वहन हेतु भारत वर्ष में दो ही रास्ते हैं।वह या तो अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं से आगे बढ़े या भौतिक रास्ते को चुने।यह चुनाव भी उसके खुद के पारिस्थितिकी पर टिका होता है।उसकी स्थिति उसे कहां तक आगे बढ़ने की इजाजत देती है इसका भी बहुत महत्व है।जिसके घर में दो जून की रोटी नहीं है वह कौन सा विकल्प चुनेगा।लेकिन बहुतायत ऐसे लोग मजदूरी करते हैं और प्रतिदिन अल्कोहल पीते हैं।कितना बड़ा अंतर्विरोध है कि जिसके पास दो जून की रोटी नहीं है वह प्रतिदिन शराब पिए और भविष्य की कोई चिंता न करे।यावदज्जीवेत सुखम जीवेत ऋणम कृत्वा घृत पिवेत।ये लोग इसी मानसिकता के व्यक्ति होते हैं।किंतु बहुत से ऐसे लोग हैं जो भविष्य की चिंता करके उसी में से कुछ रोज बचा लेते हैं।
इतना ही नहीं भारतीय मानस के अंदर भविष्य उन्मुखता अधिक पाई जाती है पर यह छवि बदल रही है।वर्तमान को आधार मानकर युवा उसे तत्काल प्राप्त कर लेना चाहते हैं।सबसे अधिक विकृति अंतर्वैयक्तिक संबंधों को लेकर है।सामाजिक संस्थाओं और आदर्श प्रतिमावली के बदलने से अंतर्वैयक्तिक संबंधों की चुले हिल गई हैं।दो महीने,चार महीने,दो वर्ष,चार वर्ष,अबोध बच्चियों के साथ दुराचार के प्रकरणों में वृद्धि हो रही है।यह समझ में नहीं आता कि मानव इतना गिर क्यों गया है।उसके अंदर पशुवत व्यवहार में बेतहाशा वृद्धि क्यों हो रही है।सबका उत्तर एक ही है हमारे सामाजिक मानक कमजोर पड़ गए हैं।हमारी सांस्कृतिक धुरी शायद जंक से जूझ रही है।हम वास्तव में मति भ्रम और लक्ष्य भ्रम में फंस गए हैं और यह सब कुछ सूचना प्रौद्योगिकी की कीमत पर विस्तार पा रहा है।
आज के युवा के मस्तिष्क में जीवन जीने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ एक और एक ही विधा कार्य कर रही है वह है आभासी जगत पर परोसे जा रहे उल्टे सीधे धारावाहिक, रील्स,दृश्य,प्रपंच जिसकी तरफ किशोर चाहे अनचाहे खींचे चले जा रहे हैं।उन्हें वही वास्तविक लग रहे हैं और उसी नक्शे कदम पर अपनी जिंदगी को जीना चाह रहे हैं।यह सर्व विदित है कि आभासी दुनिया यथार्थ नहीं है और जिसका यथार्थ से दूर दूर तक संबंध नहीं होगा ऐसे में व्यक्ति मतिभ्रम का शिकार होगा और इच्छाएं पूरी न होने पर वह तनाव में आएगा तथा दिशाहीन चिंता का शिकार होगा।व्यक्ति जब दिशाहीन चिंता के आगोश में आ जाता है तो वह बार बार तनाव का अनुभव करता है और जब बार बार तनाव होता है तो वह अवसाद का शिकार हो जाता है।
बेरोजगारी इस हद तक बढ़ गई है कि युवा लगभग आत्म समर्पण कर चुके हैं।शासकीय नौकरिया लगभग न के बराबर रह गई हैं।ले देकर निजी क्षेत्र रोजगार के लिए उपलब्ध हैं।वहां किसी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं है वहां तो योग्य व्यक्तियों की तलाश रहती है।योग्यता कठोर श्रम से अर्जित की जाती है।आज के बहुतायत विद्यार्थी श्रम करना नहीं चाहते।कक्षाओं में छात्रों की उपस्थिति दिन प्रतिदिन घट रही है।पुस्तके विद्यार्थी पढ़ना नहीं चाहते न खरीदना चाहते हैं।शिक्षक कक्षाओं में छात्रों को खोजते रहते हैं।छात्र अपना समय बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड को खोजने में लगाते हैं।आज यदि किसी छात्र के साथ कोई गर्ल फ्रेंड और बॉय फ्रेंड नहीं है तो उसकी प्रतिष्ठा छात्रों में नहीं है।ये फ्रेंड इतने चतुर होते हैं कि उन्हें कैंटीन और शॉपिंग मॉल के अतिरिक्त कुछ दिखता नहीं है।जो छात्र घर से गरीब हैं उनके अंदर इन्फेरियरिटी आती है और वे तनाव महसूस करते हैं।ऐसे में बहुत से किशोर छात्र एक दूसरे को छोड़कर नया फ्रेंड बना लेते हैं।इस चक्कर में बहुत से लड़के लड़कियां आत्महत्या भी कर लेते हैं।विद्यालयों में आत्महत्या के प्रमुख कारणों में से यह भी एक कारण है।दूसरा प्रमुख कारण अभिभावकों की अपेक्षाएं जो उनके बच्चे पूरा नहीं कर पाते।अधिक संवेदनशील होने के नाते और भावनात्मक स्तर पर कमजोर होने के कारण वे भी तनाव और अवसाद का शिकार हो जाते हैं।इसके अतिरिक्त और भी कारण तनाव के होते हैं जिससे युवा वर्ग पीड़ित होता है।पति पत्नी के बीच आए दिन होने वाले झगड़े से भी इस प्रकार की स्थितियां निर्मित होती हैं। भग्न परिवार जहां माता पिता में से कोई एक जिंदा हो अथवा दोनों न हों तो भी युवा निराशा और अंतर्द्वंद्व में उलझ जाते हैं।
लव मैरिज वाले दंपतियों के घरों के बच्चों में और भी गहरी निराशा जन्म लेती है और उनकी संताने बिल्कुल ही स्वच्छंद हो जाती हैं।इस तरह आधुनिक मीडिया, सिनेमा, मोबाइल, इंटरनेट, सूचना उपकरण और उससे उपजे संक्रमण के कारण अंतर्द्वंद्व में उलझे स्वार्थी माता पिता अपनी जिंदगी को गर्क तो कर ही रहे हैं बच्चों के जीवन को भी तनाव और अवसाद की तरफ धकेल रहे हैं।स्वस्थ जीवन के लिए भारतीय जीवन विद्या को अपनाना पड़ेगा और हमें सनातन जीवन पद्धति के तरफ लौटना ही होगा।
(महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विवि, चित्रकूट, सतना)





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