स्कूली छात्रों में बढ़ती हिंसा

राजीव त्यागी 

देश के स्कूली छात्रों मे बढ़ रही हिंसक मनोवृत्ति चिंताजनक है। हाल ही में राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा के गुरुग्राम से एक खौफनाक वारदात सामने आई है। 11वीं में पढऩे वाले एक नाबालिग छात्र ने अपने पिता की लाइसेंसी पिस्टल से 17 वर्षीय क्लासमेट को गोली मार दी। इस साजिश में आरोपी के साथ एक और नाबालिग शामिल था। पिछले कुछ समय से स्कूली छात्रों में बढ़ती हिंसा की प्रवृत्ति निश्चित रूप से डरावनी एवं खौफनाक है।


 चिंता का बड़ा कारण इसलिए भी है क्योंकि जिस उम्र में छात्रों के मानसिक और सामाजिक विकास की नींव रखी जाती है, उसी उम्र में कई छात्रों में आक्रामकता घर करने लगी है और उनका व्यवहार हिंसक होता जा रहा है। जिस उम्र में छात्रों को पढ़ाई-लिखाई और खेलकूद में व्यस्त रहना चाहिए, उसमें उनमें बढ़ती आक्रामकता, हिंसा एवं क्रूरता एक अस्वाभाविक और परेशान करने वाली बात है। भारत के छात्रों में हिंसक मानसिकता का पनपना हमारी शिक्षा, पारिवारिक एवं सामाजिक संरचना पर कई सवाल खड़े करती है। 



यह दुष्प्रवृत्ति छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन पर तो नकारात्मक प्रभाव डाल ही रही है, इसे भविष्य में समाज की शांति के लिए बड़ा खतरा भी मानना चाहिए। बड़ा सवाल है कि जिन वजहों से स्कूली छात्रों के भीतर आक्रामकता एवं हिंसा पैदा हो रही है, उससे निपटने के लिए क्या किया जा रहा है! पाठ्यक्रमों का स्वरूप, पढ़ाई-लिखाई के तौर-तरीके, बच्चों के साथ घर से लेकर स्कूलों में हो रहा व्यवहार, उनकी रोजमर्रा की गतिविधियों का दायरा, संगति, सोशल मीडिया या टीवी से लेकर उसकी सोच-समझ को प्रभावित करने वाले अन्य कारकों से तैयार होने वाली उनकी मन:स्थितियों के बारे में सरकार, समाजकर्मी एवं अभिभावक क्या समाधान खोज रहे हैं? उम्र के इस पड़ाव पर उनको सही राह दिखाने की जिम्मेदारी परिजन और शिक्षक की ही होती है। आज दोनों ही कहीं न कहीं अपनी जिम्मेदारी से दूर होते नजर आ रहे हैं। आज के समय में यह बेहद जरूरी है कि सरकार और समाज के लोग इस दिशा में गंभीरता से सोचें।

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