सुलगते सवाल
इलमा अज़ीम
लाल किले के पास हुई घटना आतंकी साजिश थी या बड़ी साजिश को अंजाम देने निकले अपराधियों की चूक से समय से पहले घटी घटना, इस बात का खुलासा तो एनआईए ही कर सकती है। लेकिन भविष्य के खतरे के मद्देनजर इस घटना की सभी दृष्टिकोणों से जांच की जानी चाहिए। इस घटनाक्रम के बाद सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता के प्रश्न भी हमारे सामने हैं कि कैसे अपराधी इतनी भारी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ राजधानी में ले जाने में सफल हुए।
जिसके चलते भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिये सभी जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए। याद रहे कि अतीत में भी कई बार दिल्ली को आतंक से दहलाने की कोशिशें हुई हैं। हमें उन घटनाओं से भी सबक लेने की जरूरत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आतंकवाद के मामले में जरा सी चूक भी व्यापक क्षति का सबब बन सकती है। देश को अस्थिर करने की किसी भी साजिश को विफल बनाने और आम लोगों का जीवन सुरक्षित बनाने के लिये सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
इस नये टेरर मॉड्यूल के मद्देनजर भी निगरानी का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। पता लगाने की जरूरत है कि कैसे अपराधी इतनी बड़ी मात्रा में विस्फोटक पदार्थ वाया फरीदाबाद दिल्ली पहुंचाने में सक्षम बने। वैसे हाल के वर्षों में देश के भीतर आतंकी घटनाओं पर लगभग विराम लगा हुआ था, लेकिन हालिया घटना ने हमारी चिंताओं को बढ़ाया ही है। हमें आतंकवाद को बढ़ावा देने के हर प्रयास को सख्ती से कुचलने की जरूरत है। सजग और सतर्क खुफिया तंत्र इसमें निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
व्हाइट कॉलर आतंकी मॉड्यूल का पनपना हमारी गहरी चिंता का विषय भी होना चाहिए। धमाके का स्तर और उससे हुई जनधन की हानि चिंता बढ़ाने वाली है। निश्चित ही यह घटना एक बड़ी साजिश की ओर इशारा करती है।
सवाल यह भी उठता है कि चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के बीच अपराधी कैसे इतनी बड़ी मात्रा में ज्वलनशील पदार्थ संवेदनशील इलाके में ले जाने में सफल हुए। दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से इस आतंक के स्लीपर सैल में डॉक्टरों के समूह का शामिल होना बेहद चिंता का विषय है। जो समाज के उस विश्वास को तोड़ता है कि डॉक्टर हमेशा जीवन देने वाला ही होता है।






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