त्वरित न्याय की दरकरार

इलमा अज़ीम 

पिछले वर्ष के आकलन से पता चलता है कि त्वरित न्याय का सपना अभी भी अधूरा है। नई व्यवस्था के तहत गवाहों के मुकरने के रास्ते बंद किए गए और यदि ठोस प्रमाण न हो तो न्याय को लंबित न रखने का निर्देश भी दिया गया। साथ ही, संदेह का लाभ अभियुक्त को देकर बरी करने का प्रावधान भी किया गया। हालांकि, वास्तविकता में न्यायपालिका का चेहरा अभी भी पूरी तरह से नहीं निखरा है। न्याय प्रक्रिया में देरी और लंबित रह जाने की प्रवृत्ति अभी भी कायम है। 

जहां तक फौजदारी मुकदमों का सवाल है, ये गंभीर अपराधों से जुड़े होते हैं, जैसे दुष्कर्म, हत्या, अपहरण, नाजायज दंगा और फसाद। हालांकि, न्यायालय ने देखा है कि इन फौजदारी मुकदमों में भी अक्सर पुलिस की उदासीनता, वकीलों का रवैया और भगोड़ों की उपस्थिति के कारण देरी हो जाती है, जिससे मुकदमों का लंबित रहना सामान्य बात हो जाती है। 



जब मुकदमा दायर होने के बाद सुनवाई में विलंब होता है, तो आरोपितों को जमानत मिलना आसान हो जाता है। लेकिन, सबसे अधिक गड़बड़ी दीवानी मुकदमों में देखने को मिलती है, जहां मुकदमों की सुनवाई और त्वरित निपटान की प्रक्रिया अभी भी पूरी तरह से सशक्त नहीं हो पाई है। दरअसल, नई दंड संहिता लागू होने के बावजूद जनता अभी भी लंबित न्याय के इंतजार में है। 



सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट ने पाया है कि दीवानी मुकदमों में जिन लोगों को डिक्री मिल गई, उसे लागू करवाने के लिए निष्पादन याचिकाओं पर एग्जीक्यूशन हुक्म नहीं मिल पाते। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि राज्यों के हाईकोर्ट एक प्रक्रिया विकसित करें और लंबित याचिकाओं के प्रभावी एवं शीघ्र निपटारे के लिए जिला न्यायपालिका का मार्गदर्शन करें। निष्पादन याचिकाओं को छह महीनों में निपटा देना चाहिए। उन्होंने पाया कि निष्पादन याचिकाएं तो 3-4 वर्षों तक लंबित रहती हैं। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर न्याय प्रक्रिया त्वरित बनानी है तो इस तौर-तरीके को बदलना पड़ेगा।

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