बंद हो प्रकृति से छेड़छाड़

 इलमा अज़ीम 
देश के कई इलाकों में इन दिनों लोगों को भारी बरसात की वजह से त्रासदी झेलनी पड़ी है। उत्तराखंड के धराली में भूस्खलन के बाद से लापता 68 लोगों का अभी तक पता नहीं चल पाया है। धराली के अलावा हिमालय पर्वतीय शृंखला में बसे कई इलाकों में लोगों को मौसम का प्रकोप झेलना पड़ा है। पहाड़ी इलाकों में बादल फटने और मैदानी क्षेत्रों में बिजली गिरने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
 मैदानी इलाकों में कभी भीषण गर्मी, तो कभी अचानक हुई बारिश से लोगों का जीना मुहाल हो गया है। पिछले कुछ दिनों में दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और यूपी समेत कई राज्यों में अप्रत्याशित आंधी बारिश देखी गई। मौसम में इस तरह का बदलाव जलवायु परिवर्तन का नतीजा है, जिससे दुनिया भर में मौसम का चक्र बिगड़ गया है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर वैज्ञानिक अक्सर चेताते रहते हैं, लेकिन विकास की होड़ में प्रकृति का विनाश थम नहीं रहा है।
 वैज्ञानिकों की चेतावनी अनसुनी कर हिमालय क्षेत्र में विभिन्न विकास परियोजनाओं में तेजी के बाद से पहाड़ी इलाकों में त्रासदी बढ़ी है। त्रासदी का यह एक पहलू है कि पहाड़ी इलाकों में राहत एवं बचाव दलों को भेजकर आपदा प्रबंधन कर लिया जाता है। न तो लापता लोगों का पता चल पाता है और न ही कोई ऐसी ठोस योजना आकार ले पाती है, जिससे सुनिश्चित किया जा सके कि जान-माल का नुकसान नहीं होगा। दूसरा पहलू मैदानी इलाकों का है, जब बारिश की वजह से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। सड़कें बंद हो जाती हैं, जलभराव से जीना मुहाल हो जाता है। इस तरह की समस्याएं बढ़ती जा रही हैं। सरकार के पास आपदा मोचन बल जैसी संस्था है, जो आपदाग्रस्त इलाकों में उतारी जाती है। क्या कभी इस सवाल पर विचार हुआ है कि बढ़ती जा रही इस तरह की समस्याओं से निपटने के लिए तैयारियां कहीं कम तो नहीं? तैयारियों में कहां चूक होती है, यह देखना होगा। हमें प्री डिजास्टर मैनेजमेंट पर काम करना होगा। प्राथमिकता इस बात की होनी चाहिए कि हादसे से पहले लोगों की जान कैसे बचे और भूस्खलन, जलजमाव, खस्ताहाल सड़कें, बदहाल निकासी से जनजीवन को प्रभावित होने से कैसा बचाया जा सके। मौसम ने इस बार जैसा रंग दिखाया है, उसके बाद हमारी नींद खुल जानी चाहिए। 


हर साल ऐसा लगता है कि गर्मी पिछले बरस से अधिक पड़ रही है। सर्दी का मौसम सिकुड़ता जा रहा है, जबकि बारिश अनियमित हो चली है। गर्मी में पानी के लिए तरसने वाले इलाकों में बारिश के दौरान नागरिक सुविधा के इंतजाम पानी में बह जाते दिखे हैं। ये सारे संकेत डराने वाले हैं और साथ ही चेताने वाले भी। दो स्तरों पर काम करने की जरूरत है: पहला उपाय दीर्घकालिक हो और दूसरा फौरी। तुरंत राहत के रूप में उन लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना चाहिए, जिन्हें खुले में काम करना पड़ता है, जैसे श्रमिक, यातायात पुलिसकर्मी, रेहड़ी-पटरी दुकानदार आदि। दीर्घकालिक उपाय के तहत कड़े कदम उठाने पड़ेंगे।
 हमारे महानगरों में नदियों-तालाबों पर तेजी से कब्जा हो रहा है। आर्द्रभूमि पर इमारतें खड़ी की जा रहीं। इसे रोकना होगा। हरियाली बढ़ानी होगी। प्रकृति से छेड़छाड़ को बंद करना होगा। सेंसिटिव जोन में निर्माण कार्य प्रतिबंधित हो। नदियों, नालों, खालों को एक मुहिम चलाकर अतिक्रमण मुक्त करना होगा। जब तक हम नदियों, नालों और खालों के साथ छेडखानी बंद तब तक प्रकृति ऐसा ही तांडव करती रहेगी।
 लेखिका एक स्वतंत्र पत्रकार है 

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