शहर की चमक, गाँव का अंधियारा


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

अरे साहब! क्या बताएं, हमारे छोटे से गाँव, 'रंगपुर' में एक नया 'सूर्य' उदय हुआ था। नाम था उसका 'विकास-प्रिय' नेताजी। वैसे तो उनका असली नाम 'कंचनलाल' था, लेकिन चुनाव जीतने के बाद, उन्होंने खुद को 'विकास-प्रिय' घोषित कर दिया था। उनकी चाल में ऐसी फुर्ती थी, मानो अभी-अभी किसी 'रील्स' पर 'वायरल' होने की तैयारी कर रहे हों। उनके भाषण? आह! वो तो ऐसे होते थे, जैसे किसी 'मल्टीनेशनल कंपनी' का 'प्रोडक्ट लॉन्च' हो रहा हो। "मित्रों! अब रंगपुर 'स्मार्ट गाँव' बनेगा! हर घर में 'वाई-फाई', हर खेत में 'डिजिटल सिंचाई', और हर चौराहे पर 'सेल्फी पॉइंट'!" उनके हर वाक्य के बाद तालियों की गड़गड़ाहट ऐसी होती थी, मानो किसी 'रॉक कॉन्सर्ट' में 'एन्कोर' की मांग हो रही हो। नेताजी का घमंड तो सातवें आसमान पर था। उन्हें लगता था कि उनके 'विजन' के सामने 'आइंस्टीन' भी पानी भरते होंगे। उनके 'पंख' यानी उनके चमचमाते कुर्ते और 'ब्रांडेड' जूते, उन्हें इस बात का एहसास दिलाते थे कि वह 'धरती' पर 'विकास' के अकेले 'अवतार' हैं। वह अक्सर कहते, "ये पुराने लोग, ये 'रूढ़िवादी' सोच वाले, इन्हें क्या पता 'ग्लोबल वार्मिंग' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' क्या होता है? ये तो बस 'खेती-किसानी' और 'गाय-भैंस' में ही अटके रहेंगे!" उनकी बातों में इतनी 'कटाक्ष' और 'व्यंग्य' होता था कि बेचारे गाँव वाले, जो 'डिजिटल' का मतलब 'उंगली से फोन चलाना' समझते थे, बस सिर खुजाकर रह जाते थे। नेताजी को लगता था कि गाँव की हर पुरानी चीज़ 'पिछड़ापन' की निशानी है, और उसे 'मिटाकर' ही 'प्रगति' का 'महामार्ग' प्रशस्त किया जा सकता है। उनकी आँखों में 'महानगरों' की 'चकाचौंध' थी, और वह रंगपुर को उसी 'चकाचौंध' में 'धकेलने' को आतुर थे, भले ही उस 'चकाचौंध' में गाँव की आत्मा ही क्यों न 'दम तोड़' दे। उनके लिए 'विकास' सिर्फ 'दिखावा' था, एक 'फोटो-ऑप', जिसे 'सोशल मीडिया' पर 'अपलोड' करके 'वाहवाही' लूटी जा सके।



एक दिन, नेताजी अपनी 'पार्टी' के 'गुर्गों' और कुछ 'ठेकेदारों' के साथ गाँव के पुराने बरगद के पेड़ के नीचे खड़े थे। वही बरगद, जिसकी जड़ों में गाँव की सदियों पुरानी कहानियाँ दफन थीं, जिसकी घनी छाँव में न जाने कितनी पीढ़ियों ने सुख-दुख बांटे थे। नेताजी ने अपने 'टैबलेट' पर कुछ 'स्वाइप' करते हुए फरमाया, "देखिए, ये बरगद! कितना 'ऑब्सीलीट' है! न कोई 'एस्थेटिक अपील', न कोई 'मॉडर्न यूटिलिटी'! इसकी जगह हम एक 'स्टेट-ऑफ-द-आर्ट' 'सोलर पैनल पार्क' लगाएंगे। गाँव को 'चौबीसों घंटे बिजली' मिलेगी, और हम 'कार्बन फुटप्रिंट' भी कम करेंगे!" वहीं पास में, अपनी खाट पर बैठे, हुक्का गुड़गुड़ाते हुए, गाँव के सबसे बुजुर्ग, 'ताऊ धरोहर' ने अपनी धीमी, लेकिन गहरी आवाज़ में कहा, "बेटा, ये बरगद सिर्फ पेड़ नहीं, ये हमारे पुरखों की निशानी है। इसकी जड़ें जितनी गहरी हैं, उतनी ही गहरी हमारी परंपराएँ। इसकी छाँव में सिर्फ इंसान नहीं, कितने पंछी, कितने जानवर पलते हैं। और ये जो 'सोलर पैनल' की बात कर रहे हो, वो तो धूप में इतनी गर्मी पैदा करेगा कि पास के कुएँ सूख जाएँगे।" नेताजी ने उन्हें ऐसे देखा, जैसे किसी 'एलियन' ने 'संस्कृत' में 'भाषण' दे दिया हो। "ताऊ! आप 'आउटडेटेड' हो चुके हैं! ये 'इको-फ्रेंडली' और 'ग्रीन एनर्जी' का ज़माना है। आप 'प्रोग्रेस' के दुश्मन हैं! आपकी सोच 'नैरोगेज' की तरह है, जबकि हम 'बुलेट ट्रेन' दौड़ाना चाहते हैं!" उनके 'पंचलाइन' पर उनके 'गुर्गे' ऐसे हँसे, जैसे किसी 'कॉमेडी शो' में 'लाफ्टर ट्रैक' बज रहा हो। ताऊ ने एक लंबी साँस ली, और बस अपनी खाट पर करवट बदल ली। उन्हें पता था कि इस 'अंधे विकास' की 'बुलेट ट्रेन' कहाँ जाकर रुकेगी, लेकिन उनकी आवाज़ 'डीजल इंजन' के शोर में दब चुकी थी। नेताजी को लगा उन्होंने 'ज्ञान' का 'अमृत' पिला दिया है, जबकि उन्होंने गाँव की 'साँसों' पर 'कुल्हाड़ी' चला दी थी।

और फिर, 'विकास' की 'बुलेट ट्रेन' सरपट दौड़ने लगी। बरगद कटा, उसकी जगह चमचमाते, काले-काले 'सोलर पैनल' लग गए। गाँव की पगडंडियाँ 'स्मार्ट रोड' में बदल गईं, जिन पर धूल का ऐसा गुबार उड़ता था कि 'दमा' के मरीज खाँस-खाँस कर 'वेंटिलेटर' पर पहुँच जाते। नेताजी ने 'डिजिटल लाइब्रेरी' के नाम पर एक खाली कमरा बनवा दिया, जिसमें सिर्फ एक पुराना 'कंप्यूटर' था, वो भी बिना 'इंटरनेट' के। 'वाई-फाई' के खंभे लगे, लेकिन 'सिग्नल' का पता नहीं था, सिवाय 'नेटवर्क बिजी' के। गाँव के छोटे-मोटे दुकानदार, जिनकी दुकानें बरगद के नीचे लगती थीं, उन्हें हटा दिया गया, क्योंकि वे 'स्मार्ट गाँव' की 'एस्थेटिक' को 'खराब' कर रहे थे। अब वे बेचारे कहाँ जाएँ? नेताजी ने कहा, "ये 'अस्थायी असुविधा' है, 'स्थायी विकास' के लिए!" गाँव वाले पहले तो 'चकाचौंध' में आ गए। उन्हें लगा, सच में 'अमृतकाल' आ गया है। 'सेल्फी पॉइंट' पर युवा 'टिकटॉक' वीडियो बनाने लगे, भले ही उनके घरों में पीने का पानी न हो। 'स्मार्ट रोड' पर बच्चे 'क्रिकेट' खेलने लगे, क्योंकि अब वहाँ कोई गाड़ी आती-जाती नहीं थी, सिवाय नेताजी की 'एसयूवी' के। गाँव की पुरानी पोखर, जहाँ गाँव की औरतें कपड़े धोती थीं और बच्चे नहाते थे, उसे 'ब्यूटीफिकेशन' के नाम पर सुखा दिया गया और उसमें 'फव्वारे' लगा दिए गए, जो कभी चलते ही नहीं थे। गाँव की 'सच्चाई' पर 'पेंट' कर दिया गया था, ताकि 'विकास' की 'तस्वीर' अच्छी लगे। लेकिन 'पेंट' की परत के नीचे, 'सच्चाई' की 'दीवारें' दरक रही थीं, और किसी को उसकी 'आवाज़' सुनाई नहीं दे रही थी, सिवाय उन बूढ़ी आँखों के, जिन्होंने गाँव को बदलते देखा था।

समस्याएँ अब 'अस्थायी' से 'स्थायी' होने लगी थीं। पहली बरसात में ही 'स्मार्ट रोड' पर 'स्मार्ट नाले' बन गए। पानी ऐसे भर गया, मानो 'वेनिस' का 'मिनी वर्जन' हो। नेताजी ने कहा, "ये 'जलवायु परिवर्तन' का असर है, 'सिस्टम' की गलती नहीं!" 'सोलर पैनल पार्क' से इतनी 'रेडिएशन' निकली कि आसपास के पेड़-पौधे सूखने लगे, और कुएँ का पानी 'खारा' हो गया। गाँव की औरतें अब दूर से पानी लाने को मजबूर थीं, लेकिन नेताजी के 'सोशल मीडिया' पर 'ट्वीट' आ रहे थे, "रंगपुर में 'जल क्रांति'!" 'डिजिटल लाइब्रेरी' में धूल जम गई थी, और 'कंप्यूटर' को बच्चों ने 'गेम खेलने' के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था, जब तक कि वो 'खराब' नहीं हो गया। गाँव की 'अर्थव्यवस्था' चरमरा गई थी। छोटे दुकानदार बेरोजगार हो गए, और जो 'बड़े ठेकेदार' नेताजी के साथ आए थे, वे अपना 'काम' करके 'फुर्र' हो गए। नेताजी ने एक 'प्रेस कॉन्फ्रेंस' बुलाई और कहा, "ये सब 'विपक्षी दलों' की 'साजिश' है, हमारे 'विकास' को रोकने की! ये 'नकारात्मक' लोग हैं, जो 'प्रगति' नहीं चाहते!" उनके 'गुर्गों' ने तालियाँ बजाईं, और 'मीडिया' ने 'ब्रेकिंग न्यूज़' चला दी। गाँव वाले, जो अब 'पानी' के लिए तरस रहे थे और 'बीमारियों' से जूझ रहे थे, बस एक-दूसरे का मुँह ताकते रह गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि 'विकास' उन्हें 'बर्बाद' क्यों कर रहा है। उनकी आँखों में 'आँसू' थे, लेकिन 'आवाज़' नहीं। 'स्मार्ट गाँव' का 'सपना' अब 'दुःस्वप्न' बन चुका था, और 'नायक' की जगह 'खलनायक' बन चुका था।

ताऊ धरोहर, अपनी खाट पर लेटे, सब कुछ देख रहे थे। उनकी आँखों में कोई 'आँसू' नहीं थे, बस एक गहरी 'उदासी' थी, जो 'समुद्र' से भी गहरी थी। उन्हें याद आ रहा था, कैसे उनके बचपन में गाँव में हरियाली थी, कुएँ लबालब भरे रहते थे, और हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू रहती थी। अब सिर्फ धूल थी, और 'सोलर पैनल' से निकलती 'गर्म हवा'। उनके पोते-पोतियाँ, जो कभी बरगद पर झूला झूलते थे, अब 'स्मार्ट रोड' पर 'लू' से बचने के लिए घरों में दुबके रहते थे। उनकी बहू, जो कभी गाँव की पोखर पर खुशी-खुशी कपड़े धोती थी, अब दूर से पानी लाते-लाते थक चुकी थी, और उसके हाथों में छाले पड़ गए थे। ताऊ ने कभी नेताजी से बहस नहीं की, क्योंकि उन्हें पता था कि 'खाली बर्तन' ही ज्यादा शोर करते हैं। उन्होंने बस अपनी 'पुरानी डायरी' निकाली, जिसमें उन्होंने गाँव की 'पुरानी तस्वीरें' चिपका रखी थीं। एक तस्वीर में बरगद के नीचे गाँव की पंचायत बैठी थी, सब खुश थे। दूसरी में बच्चे पोखर में नहा रहे थे, उनकी हँसी गूँज रही थी। अब सब कुछ 'खामोश' था। ताऊ को लगा, जैसे उनके 'अंदर' भी कुछ 'टूट' रहा है। ये 'विकास' नहीं, 'विनाश' था, एक ऐसा 'विनाश' जो 'चमकदार पैकेजिंग' में आया था। उनकी आत्मा रो रही थी, लेकिन उनके चेहरे पर 'पत्थर' की 'खामोशी' थी। उन्हें पता था कि 'अंधे' को 'रास्ता' नहीं दिखाया जा सकता, और 'घमंडी' को 'सच्चाई' नहीं बताई जा सकती। उनका 'दिल' 'चीख' रहा था, लेकिन 'होठों' पर 'ताला' पड़ा था।

और फिर आया वो दिन, जब नेताजी ने 'स्मार्ट गाँव' के 'कंप्लीट प्रोजेक्ट' का 'भव्य उद्घाटन' रखा। 'दिल्ली' से बड़े-बड़े 'मंत्री' आए, 'हेलीकॉप्टर' उतरा, 'मीडिया' का जमावड़ा लगा। नेताजी ने 'रिबन' काटा, 'फोटो' खिंचवाई, और 'भाषण' दिया, "आज रंगपुर ने 'विकास' की नई 'गाथा' लिखी है! ये 'मॉडल गाँव' बनेगा, जिसे पूरा देश देखेगा!" तालियाँ बजीं, 'गुलाब' की पंखुड़ियाँ बरसीं, और 'लड्डू' बांटे गए। लेकिन 'उद्घाटन' के ठीक बाद, 'प्रकृति' ने अपना 'खेल' खेला। 'सोलर पैनल' की 'गर्मी' और 'भूजल' के अत्यधिक दोहन से गाँव में 'भीषण सूखा' पड़ गया। कुएँ सूख गए, हैंडपंपों से हवा निकलने लगी, और खेत 'बंजर' हो गए। गाँव में 'पानी' के लिए 'हाहाकार' मच गया। जो लोग 'उद्घाटन' में 'लड्डू' खा रहे थे, अब 'पानी' के लिए 'तरस' रहे थे। 'मंत्री' लोग 'हेलीकॉप्टर' से उड़ गए, 'मीडिया' ने 'अगली ब्रेकिंग न्यूज़' पकड़ ली, और नेताजी? नेताजी ने 'ट्वीट' किया, "ये 'प्राकृतिक आपदा' है, हम 'राहत कार्य' में लगे हैं!" लेकिन 'राहत' कहीं नज़र नहीं आई। गाँव के बच्चे 'प्यास' से बिलख रहे थे, बूढ़े 'पानी' की एक-एक बूँद को तरस रहे थे। 'स्मार्ट गाँव' का 'स्मार्ट विकास' अब 'स्मार्ट तबाही' बन चुका था। 'विकास' की 'चकाचौंध' में 'गाँव' की 'आत्मा' 'दम तोड़' रही थी, और 'नेताजी' अपने 'अगले प्रोजेक्ट' की 'फाइल' देख रहे थे।

गाँव में अब 'मातम' का सा माहौल था। लोग अपने घरों को छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने लगे थे। खेत 'सूख' चुके थे, मवेशी 'मर' रहे थे, और 'बीमारियों' ने डेरा डाल लिया था। 'स्मार्ट रोड' पर अब सन्नाटा पसरा था, सिवाय 'एम्बुलेंस' के सायरन के। 'सेल्फी पॉइंट' पर अब कोई 'सेल्फी' नहीं खींचता था, क्योंकि वहाँ सिर्फ 'धूल' और 'बर्बादी' की 'तस्वीर' थी। नेताजी 'गायब' हो चुके थे। उनका 'फोन' 'स्विच ऑफ' था, और उनके 'गुर्गे' भी 'भूमिगत' हो गए थे। गाँव वाले नेताजी को कोस रहे थे, लेकिन अब क्या फायदा? 'चिड़िया खेत चुग गई थी'। उनकी आँखों में 'आँसू' थे, 'क्रोध' था, और एक 'अजीब सी खालीपन' थी। उन्होंने 'विकास' के नाम पर अपना 'सब कुछ' खो दिया था। उनकी 'साँसें' भारी थीं, और 'दिल' में 'कसक' थी। 'स्मार्ट गाँव' का 'सपना' अब 'शमशान' बन चुका था, जहाँ सिर्फ 'पुरानी यादें' और 'बर्बादी' की 'गंध' थी।


ताऊ धरोहर, अपनी खाट पर बैठे, आँखों में 'सूखे कुएँ' और 'बंजर खेत' लिए, उस 'स्मार्ट गाँव' के 'खंडहरों' को देख रहे थे। उनके 'चेहरे' पर 'झुर्रियाँ' और गहरी हो गई थीं, मानो हर 'झुर्री' एक 'दर्दनाक कहानी' कह रही हो। उन्होंने एक लंबी साँस ली, जो 'हवा' में 'घुल' गई, और उनकी आँखों से एक 'आँसू' लुढ़का, जो उनकी 'झुर्रियों' को पार करता हुआ, 'मिट्टी' में 'समा' गया। उन्हें लगा, जैसे 'गाँव' भी उनके साथ 'रो' रहा है। नेताजी? वो तो अब किसी और 'ज़िले' में 'विकास' का 'नया डंका' पीट रहे थे, अपने 'पुराने प्रोजेक्ट' को 'सफलता' की 'मिसाल' बताकर। उन्हें क्या पता, 'रंगपुर' में उनकी 'सफलता' ने कितनी 'ज़िंदगियाँ' 'तबाह' कर दी थीं। ताऊ ने अपनी खाट से उठने की कोशिश की, लेकिन उनके 'शरीर' में 'ताकत' नहीं थी। वह बस 'निराशा' और 'पीड़ा' के 'अंधेरे' में 'डूब' गए। 'विकास' की 'चमक' ने 'गाँव' को 'अंधेरे' में 'धकेल' दिया था, और 'ताऊ धरोहर' उस 'अंधेरे' के 'अकेले गवाह' थे। उनकी 'आत्मा' 'चीख' रही थी, लेकिन 'आवाज़' 'गूँगी' हो चुकी थी। 'स्मार्ट गाँव' का 'सपना' अब 'टूट' चुका था, और उसकी 'किरचें' 'दिल' में 'चुभ' रही थीं।

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