सीएम पर मंथन जारी
इलमा अज़ीम
दिल्ली के सीएम को लेकर भाजपा में मंथन का दौर जारी है। भाजपा आलाकमान की मंशा है कि ऐसा मुख्यमंत्री बनाया जाए जो न केवल पार्टी के भीतर सामंजस्य बनाए रखे, बल्कि वह जनता की अपेक्षाओं को भी पूरा करे। दरअसल दिल्ली के मतदाताओं ने 10 वर्षों के बाद आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर कर भाजपा को चुना है और अब उनकी उम्मीदें भी भाजपा से जुड़ी हुई हैं। दिल्ली विधानसभा का कार्यकाल 23 फरवरी को समाप्त हो रहा है, लिहाजा इससे पहले शपथ ग्रहण होने की संभावना है। सीएम को लेकर भाजपा में लगातार मंथन का दौर जारी है। फिलहाल विधायक दल की बैठक टल गई है। टल गई है।
अनुमान लगाया जा रहा है कि यह बैठक 19 फरवरी को हो सकती है और उसके अगले दिन यानी 20 फरवरी को नए मुख्यमंत्री शपथ ले सकते हैं। भाजपा ने चुनाव में अपनी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया था और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे से लौटने के बाद पार्टी इस मामले में निर्णायक कदम उठाने जा रही है। दरअसल भाजपा के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर चुनाव परिणाम आने के बाद ही कयास लगाए जा रहे हैं। इस मामले में विधायकों में विजेंद्र गुप्ता, प्रवेश वर्मा, रेखा गुप्ता, सतीश उपाध्याय, आशीष सूद, पवन शर्मा, अजय महावर आदि के नाम सामने आ चुके हैं।
जबकि सूत्रों का कहना है कि भाजपा मुख्यमंत्री व उनके सहयोग मंत्रियों के चयन में कोई ठोस निर्णय लेगी। सियासी दिग्गजों की मानें तो भाजपा आलाकमान किसी सांसद को भी मुख्यमंत्री बना सकता है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अलग अलग स्तरों पर मंथन किया जा रहा है और जातिगत समीकरणों के साथ ही सामाजिक और भौगोलिक आधार पर संभावित लोगों के नामों पर विचार किया जा रहा है।
पार्टी के एक सीनियर लीडर के मुताबिक, कुछ नामों पर चर्चा है लेकिन ये कहना संभव नहीं है कि इन विधायकों को ही कैबिनेट की जिम्मेदारी दी जाएगी या नहीं। इस बार बीजेपी के 48 विधायक जीत कर विधानसभा पहुंचे हैं। इनमें से कई पहली बार चुने गए हैं और कुछ दूसरी पार्टियों से आए हैं। अलबत्ता पार्टी के नेता इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि मुख्यमंत्री, मौजूदा विधायकों में से ही चुना जाएगा। इसकी वजह ये है कि अगर किसी सांसद को सीएम बनाया जाता है तो दिल्ली में दो उपचुनाव कराने होंगे।
एक मुख्यमंत्री बनने वाले के लिए किसी विधायक से इस्तीफा दिलाना होगा और फिर जिस सांसद को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, उसकी जगह लोकसभा के सदस्य के लिए उपचुनाव कराना होगा। यही वजह है कि शायद पार्टी नेतृत्व मौजूदा विधायकों में से ही किसी को मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी सौंपे।




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