(यादों के झरोखे से )
गाँव- गिराव: गुमनाम हुनरमंद
- डा. ओपी चौधरी
आज मैं आपको अपने गाँव (मैनुद्दीनपुर,जलालपुर, अंबेडकरनगर, पूर्व अयोध्या जनपद, उत्तर प्रदेश) ले चलता हूं,जहां के कुछ अविस्मरणीय चरित्र और उनके गजब के काम, जिन्हें कभी भुला नहीं पाते, लेकिन स्मृतियां भी कितनी मधुर होती हैं, कि उन्हें हमेशा संजोए रहना चाहती हैं।मुंशी प्रेमचंद जी ने ठीक ही लिखा है कि अतीत की स्मृतियां चाहे जैसी हों, वे सुखद लगती हैं। आज से 50 वर्ष पूर्व हमारे गांवों की हालत कैसी रही होगी, इसका अनुमान आज के युवा या किशोर नहीं लगा सकते, खासकर वो जो महानगर में पैदा हुए, क्योंकि उनके माता पिता (हम जैसे लोग) रोजी के फेर में शहर आ गए और अब कभी कभार गांव जाते हैं। युवाओं की पिकनिक जैसी होती है, अपने पूर्वजों की जन्मभूमि पर जाना। उसी पीढ़ी के लिए यह लिखने को सोचा हूं ताकि वो भी हमारी विरासत से,हमारे सफर से वाकिफ हो सकें।
गाँवों में तब बहुत आजादी थी, आनंद था, सुख था, संतोष था, वैभव भले ही नहीं था। सभी के चेहरे पर प्रसन्नता के भाव रहते थे। आपस में बहुत ज्यादा लगाव हुआ करता था। बिना किसी कौशल विकास केन्द्र में प्रशिक्षण लिए ही लोग अपने काम में माहिर थे। वे लोग बचपन से ही अपने दादा-परदादा के हुनर को देखते रहते थे। उनके साथ काम करते-करते उस हुनर में पारंगत हो जाते थे। इस प्रकार कोई भी हुनर पीढी दर पीढी चलता रहता था। वह हुनर चाहे बढईगीरी का था, लुहार का था, कुंभकार का था, धोबी का था या खपड़ा नरिया बनाने का, छान छप्पर, टाटी बनाने का, खटिया मचिया बीनने या खपड़ा नरिया से घर छाने का।
इसी तरह के कई-कई हुनर अपने आप बच्चे सीख जाते थे।
ऐसे लोग या तो पढ़े लिखे होते ही नहीं थे या फिर कम पढ़े लिखे होते थे।लेकिन उनके ज्ञान और हुनर का बड़े-बड़े लोग लोहा मानते थे। ऐसे ही कुछ चरित्रों के बारे में मैं उल्लेख करने जा रहा हूँ। ये सभी चरित्र मेरे गाँव और उसके आसपास के गांवों के हैं, जिनसे मेरा बचपन में खुद का गहरा लगाव था। इन कुछ खास चरित्रों से मैंने भी थोड़ा बहुत सीखा है, श्रम का महत्व समझ सका, जीवन का फलसफा पढ़ सका। उनमें पुद्दन बाबा फावड़ा चलाने और उल्झा फेंकने में माहिर थे, इस कार्य को मैने उन्हीं से सीखा।कामता काका मेड़ बांधने के जादूगर थे, उनसे भी सीखा, लेकिन वैसा बांध नहीं पाया, कोशिश जरूर किया। अच्छू बाबू गाय, भैंस का दूध दुहने में माहिर थे, पास पड़ोस में भी जाते थे, अब उम्र के चौथेपन में जीवनसंगिनी के गोलोकवासी होने और अस्वस्थता के कारण घर पर ही आराम करते हैं। सूकन दादा हल चलाने आते थे तो मट्ठा जरूर पीते थे, न रहने पर आटा में पानी मिलाकर उसका घोल दे दिया जाता था और वे आराम से मट्ठा समझकर पी लेते थे, शायद यही उनके स्वास्थ्य का राज था। झउवा, झौली, खंचोली, खांची बिनने में कतारू काका, बरसातू बाबा, खटिया, मचिया बिनने के लिए भिरगू काका, हमारे केशव राम भाई भी कुछ कुछ काम बिनायी का कर लेते हैं। अधारी दादा एक ऐसे लुहार थे जो मिट्टी के कूणे में लोहे की चिप्पी लगा दिए थे, ताकि रिसाव बंद हो सके, उन्हें देखा तो नहीं, सुना है लेकिन उनके उत्तराधिकारी संतराम चाचा की बनाई हुई कई चीज़ें हमारे साथ काशी में हैं, घर पर (मैनुद्दीनपुर) तो हैं ही, जो उनके हुनर की कहानी बयां करने के लिए काफी हैं। खुद्दी बाबा और मन्नू बाबा दोनों लोग भाई थे। खुद्दी बाबा बैलगाड़ी हांकते थे। तब बैलगाड़ी में लकड़ी का पहिया लगता था, उस पर लोहे की हाल चढ़ी होती थी। मन्नू बाबा लंबे कद के हट्टे-कट्टे थे। यद्यपि एक पैर में फाइलेरिया का प्रभाव था,किंतु उनके कार्य में वह व्यवधान नहीं उत्पन्न कर पाता था। देशी गन्ने का इतना बड़ा बोझ उठाकर लाते थे कि उसकी पेराई से एक कोल्हन (लगभग 16 से 18 लीटर) रस से भर जाती थी, गजब की ताकत थी। उनमें गुड़ बहुत खाते थे। छप्पर,टाटी बनाने का तो अच्छा हुनर था ही साथ ही मिट्टी का घर बनाने का भी गुण था।
उनके साथ ओरी काका, करन बाबा, रामदेव बाबा, हेमराज बाबा, छोटकुन बाबा, नोहर काका (जिन्हें भोथा भी कहते थे) सभी किसी न किसी काम में निपुण थे, कौशल से परिपूर्ण थे, बिना किसी संस्थान में गए। लगभग सभी लोग अनपढ़ थे, लेकिन बहुत ही मर्यादित और कार्य के प्रति समर्पित लोग थे। ओरी काका लोगों के सर से भूत प्रेत भी उतारते थे,शाम को चौरा पर बैठते थे, तब देखते ही बनता था।अब ऐसे लोगों का इस पीढ़ी में मिलना मुश्किल है।
उस समय सब कुछ गांव में उपलब्ध संसाधनों से ही मिल जाता था।खपरैल छाने से पहले ऊपर करी, धरन, कैन्चा, कबूला आदि लगाने का कार्य करते थे। लकड़ी की आलमारी हो या चारपाई (पलंग या बसखटा) बनाने से लेकर हल-जुआठ बनाने तक का काम गांवों में रहने वाले बढ़ई/लोहार लोग ही करते थे। राम लखन काका जिन्हें हम लोग पांडे काका भी कहते थे, बाटी-चोखा, अहरा पर दाल और बात बनाने की जो पाक कला उनमें थी,अब कहां मिलेगी और न ही वैसा स्वादिष्ट भोजन। मछली मारने में जोखू काका, भुल्लन दादा, श्रीराम काका जो राज मिस्त्री थे, लालजी बाबू जाल, ताप, कटियां, हलुका लेकर दोपहर में तमसा नदी में चले जाते थे और शाम को मछली लेकर लौटते थे, पूरी गर्मी यही क्रम चलता था। ये सभी लोग ऐसे थे जो विभिन्न क्षेत्रों में गजब का हुनर रखते थे।
आज उनके जैसा बनना नामुमकिन है, ये लोग प्रशिक्षण प्राप्त नहीं थे, लोगों को देखकर अनुकरण के माध्यम से, सहभागी बनकर सीखते थे। उस पीढ़ी के राम लौटन काका, सुखई काका का आशीर्वाद अभी हम सभी को प्राप्त है। इनमें से कुछ लोग अभी हम लोगों के साथ हैं, उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन की मंगलकामना। कुछ जो अब हमारे बीच नहीं हैं उनकी आज अचानक याद आ गई, और आंखों का कोना गीला कर गई।इन सभी प्रातः वन्दनीय अपने अपने हुनर के माहिर और मानवता से ओत प्रोत लोगों को सादर नमन करता हूँ।
अध्यक्ष,मनोविज्ञान विभाग
श्री अग्रसेन कन्या पी जी कॉलेज वाराणसी।

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