कठपुतली में जागी, विद्रोह की ज्वाला।
धागे से बोली मुझे आगे पीछे क्यों बांधा?
बेड़ियों मे जकड़ी हूं, स्वतंत्र होना चाहती हूं।
अपने पैरों पर खुद खड़ी होना चाहती हूं।।
खोल दो यह बंधन, कर दो मुझे आजाद।
मैं स्वयं बनाऊंगी अपना एक आधार।।
धागा बोला बिन मेरे, नहीं कोई तेरी पहचान।
गर मुझसे हो गई विलग पड़ी रहेगी बेजान।।
मै हूं बेबस, मेरी एक छोर तुझसे बंधी।
दुजी छोर कलाकार की उंगलियों में फंसी।।
कलाकार स्वयं, कहानी कविता है गढ़ता।
उसी अनुरूप मुझे उंगलियों पर रगड़ता।।
तू थिरक थिरक कर, नाच दिखाती।
कठपुतली नाम से, तू जानी जाती।।
उसने मेरा सहारा लेकर, तुझे बना दिया सजीव।
अपनी कहानियों मे गढ़कर कर दिया प्रसिद्ध।।
मेरा और कलाकार का, नहीं होता है नाम।
सभी लोग लेते है बस कठपुतली का नाम।।
कठपुतली की समझ में आ गई, धागे की सब बात।
उसे हुआ एहसास, धागे के संग है मेरा सच्चा साथ।
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- प्रियंका त्रिपाठी 'पांडेय'
प्रयागराज (उत्तर प्रदेश)

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