डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’
(हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार से सम्मानित व्यंग्यकार)
यह दुनिया भी बड़ी गजब है। इसे समझने के लिए किसी के पास कोई कुंजी नहीं है। बाल सफेद हो जायेंगे फिर भी दुनिया के रंग समझ से परे रहेंगे। यहाँ अच्छाइयों में खामियाँ और खामियों में अच्छाइयाँ निकालने वाले कदम पर कदम पर मिल जायेंगे। गांधी के पुजारी तो गोडसे के प्रशंसक भी मिल जायेंगे। आज कबीर होते तो उनके लिखे दोहों– काल करै सो आज कर और धीरे-धीरे रे मना में समय को लेकर विरोधाभासी स्वर के लिए उन्हें लताड़ देते। इसीलिए यह दुनिया बड़ी गजब है। जब तक उसे समझने का प्रयास करते हैं, तब वह अपनी समझ बदल लेता है।
अब देखिए न यदि कोई धीरे-धीरे संयमता के साथ काम करता है तो उसे बाबा आदम के जमाने का इंसान बताकर उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। यदि कोई बड़ी तेजी से काम करता है तो उसे कौनसी शताब्दी पकड़ना है बताकर उसका हौंसला को पस्त कर देते हैं। यदि कोई आत्मविश्वास दिखाने का साहस करता है तो उसे बड़ा अहंकारी बताकर उसका आत्मविश्वास जमीन के भीतर दफना देते हैं। यदि दुखी होता है तो उसे भीरू, कायर, डरपोक नामों से पुकारने की चेष्टा करते हैं। यदि संभाल-संभालकर रुपया पैसे खर्च करते हैं तो उसे कंजूस कहकर उसका मज़ाक बनाते हैं। यदि वह रुपए-पैसे खर्च करता है तो उसे आडंबर व नौटंकी करने वाला कहते हैं। यदि वह किसी पर संदेह करता है तो उसे शक्की कहकर ताना कसते हैं। यदि वह किसी पर विश्वास करता है तो उसे भोला-नादान कहकर उसके भोलेपन का परिहास करते हैं। यदि वह किसी से लड़ने-झगड़ने से बचता है तो उसे नामर्द या नपुंसक कहकर उसके लिंग पर प्रश्नवाचक चिह्न लगा देते हैं। यदि कोई पीड़ा में कराह उठता है तो उसे मौज-मस्ती समझने वालों की कोई कमी नहीं हैं यहाँ पर।
कुल मिलाकर दुनिया वाले क्या कहेंगे के डर से कई प्रतिभा के धनी मन मसोसकर रह जाते हैं। इसीलिए कहा गया है कि जिसे दुनिया पहले पागल कहती है वही आगे जाकर उनका सरताज होता है। दुनिया कदम कदम पर आपका कटाक्ष करने के लिए मौके तलाशती रहती है। इसलिए कटाक्षों की चिंता मत करो।

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