कभी फुलझड़ी की रोशनी से नहा उठता था घर आंगन
एटा। भारतीय त्योहार के उमंग उत्साह मनाने के तौर तरीके पिछले 75 दशक से भारी बदलाव हुआ है पश्चिमी रहन-सहन शैली का समावेश त्योहारों को मनाने में भी अपनी गहरी पेंठ बना लिया है इससे दीपोत्सव पर्व भी अछूता नहीं है पहले फुलझड़ी के दूधिया रोशनी से घर के अंधकार को भगाने का प्रचलन था।
जीवन के 75बसंत देख चुके कस्बा के निवासी गंगा प्रसाद वर्मा का कहना है कि आजादी से पहले मनाए जाने वाली दीपावली और आज की दीपावली मनाने के तौर तरीके में जमीन आसमान का फर्क है अपने स्कूल में पढ़ाई के दिनों की दिवाली के बारे में बताया कि आजादी से पहले गांव के अधिकांश घर मिट्टी के तो थे लेकिन कहते हैं की झोपड़ी में हीरा छिपा होता है प्रकाश पर्व दिवाली से पूर्व साफ-सफाई गाय के गोबर से घर आंगन की लिपाई के बाद गांव का माहौल एकदम खुशनुमा बन जाता था लगता था कि आज महालक्ष्मी गांव में आने वाली है प्रदेश में नौकरी पेशा करने वाले लोग दिवाली में जरूर छुट्टी आते थे
संतोष शर्मा अंगद पुर निवासी 45 वर्षीय जीवाराम कहते हैं कि आज से करीब चार दशक पूर्व दिवाली के दिन घर की महिला व पुरुष सदस्य मिलकर बरसात के चलते घर आंगन के साथ ही आसपास के झाड़ धाकड़ को भी साफ करते थे प्रयास रहता था कि कहीं गंदगी ना पहले मोमबत्ती बाजार में मिलता जरूर था लेकिन गांव में दिया दियारी के प्रयोग करने का प्रचलन था गांव में डीजे टीवी की तो बात ही नहीं कुछ विशेष लोगों के पास के रेडियो था पटाखा भी आज ऐसे नहीं थे लेकिन वह गांव के संपन्न लोगों के घर उनके बच्चों तक जायदा सीमित थी मां लक्ष्मी की पूजा करने मिठाई खाने खिलौने की परंपरा काफी थी
मोहल्ला खरा निवासी 23 वर्षीय प्रशांत शाक्य कहते हैं कि दिवाली का हमें बेसब्री से इंतजार रहता है घर की साफ सफाई के साथ ही विद्युत झालरों से बेहतर तरीके से सजाने का शौक बचपन से है हम जब इंटर कॉलेज में पढ़ते थे तब पूजा घर में सजावट टीवी सीरियल में देखे गए सजावट का नकल कर करते थे डीजे पर भक्ति भजन बजाना 3रू00 बजे से शुरू हो जाता था हम सबसे ज्यादा अनूप जलोटा के भक्ति भजन गजल जरूर सुनते हैं शाम से ही तेज आवाज वाले पटाखे फोडऩे की ओर रहती थी घर के महिला व पुरुष सदस्य एक साथ छोडऩा शुरू करते थे वर्षों से पर्यावरण संरक्षण के बाद से पटाखा फोडऩा कम कर दिया है।

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