क्यों अग्निपरीक्षा हर युग में
औरत की ही ली जाती है
मर्यादाओं की कसौटी पर
क्यों वो ही पर की जाती है
उस राम राज्य में भी सीता
मैया ने अग्नि परीक्षा दी
एक बार की पीड़ा कौन कहे
दो बार थी इसकी पीर सही




थी दिव्य शक्ति उनमें फिर भी
अपमान दोबारा सह ना सकी
आवाहन धरती मां का किया
और उसमें जाकर समा गई
पर आज की नारी में तो
कोई दैवीय शक्ति नहीं है
जो पीड़ा सीता मां की थी
पीड़ा उसकी भी वही है
पुरुषों से सम्मानित जीवन को
आज भी तरस रही है
पल-पल अपमानित होकर भी
जीने को विवश रही है।
आज की तुलना में उस युग की
नारी का जीवन साधा था
घर देखे वह बाहर हो पुरुष
बंटवारा आधा-आधा था
और आज की नारी ना केवल
घर गृहस्थी चला रही है
धरती ही नहीं नभ में भी
शौर्य का परचम लहरा रही है।

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मीनेश चौहान "मीन"
फर्रुखाबाद (उप्र)

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